आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने कहा कि भारत ही एक ऐसा देश है जहां धर्म और विज्ञान में कभी विरोधाभास नहीं हुआ। हम हमेशा दोनों को साथ लेकर चले क्योंकि हमारा देश समग्र ज्ञान की परंपरा को लेकर चलता है।
ये बातें उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय दो दिवसीय पुरातन छात्र समागम का उद्घाटन करते हुए कहीं। ‘यह क्या है, ये विज्ञान है, मैं क्या हूं ये ज्ञान है’ इस वक्तव्य से उन्होंने ज्ञान और विज्ञान के अंतर को समझाया।
सोमवार को स्वतंत्रता भवन में आयोजित पुरातन छात्र समागम में ‘विज्ञान एवं धर्म : महामना की दृष्टि’ पर आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि श्रीश्री रविशंकर ने कहा कि ज्ञान और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। ज्ञान के तीन तत्व होते हैं। इंद्रीय जन्य ज्ञान, बुद्धि जन्य ज्ञान और तीसरा बुद्धि के अतीत का ज्ञान।
आज जितने भी इनोवेशन हो रहे हैं, वे ज्यादातर बुद्धि के अतीत के ज्ञान पर आधारित हैं। उन्होंने कहा विमर्श करो, प्रश्न करो, यही विज्ञान है। प्रश्न पूछना विज्ञान का एक अंग है। हमें धर्म या विज्ञान को लेकर किसी पूर्वाग्रह में नहीं रहना चाहिए। श्रीश्री ने कहा कि हृदय हमेशा पुराने की खोज में जाता है और बुद्धि की खोज नए की तरफ।
हृदय और बुद्धि दोनों का संगम ही जीवन है। दोनों का संतुलन होने से जीवन सुंदर होता है। इसलिए हमें पुराने जड़ पर गर्व करना चाहिए और नए फूलों पर ध्यान देना चाहिए। यही प्रगति का मार्ग है और यही पुरातन और आधुनिक विज्ञान है। आखिर में उन्होंने लोगों को सलाह दी कि जीवन में पूर्वाग्रह छोड़ें, आग्रह करें, विग्रह के द्वारा जो अमूर्त है, विश्व चैतन्य है, उसे ग्रहण करें और अनुग्रह के पात्र हो जाएं।