वाराणसी। शिव की नगरी काशी विश्व की प्राचीनतम नगरी कही जाती है। कई कालखंडों का इतिहास समेटे काशी का कण-कण रहस्यों से भरा हुआ है। शिवपुर में स्थित पांचों पांडव का शिवाला भक्तों की आस्था का केंद्र है। काशी खंड के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने काशी में पंचक्रोशी परिक्रमा की थी। इस दौरान उन्होंने शिवपुर में पांच शिवलिंग स्थापित कर आराधना की थी और यहीं पर रात्रि विश्राम किया था। ऐसी मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नुकल और सहदेव ने की थी। दूर-दूर से लोग आकर इस मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। मंदिर के पुजारी का कहना है कि यह मंदिर पांडवों ने उस दौरान स्थापित किया था जब वे अज्ञातवास के दौरान पंचक्रोशी यात्रा करने काशी आए थे।
मंदिर से थोड़ी दूर पर ही द्रौपदी कुंड भी है। इसका निर्माण अर्जुन ने अपने तीर से किया था। पूरा इलाका उस समय जंगल था। द्रौपदी को बहुत प्यास लगी थी तब अर्जुन ने तीर से कुंड का निर्माण किया था। मान्यता है कि कुंड का जल पीने से किसी भी तरह का ज्वर ठीक हो जाता है। एक मंदिर माता द्रौपदी के कुंड के सामने है। यहां पीला मिष्ठान, पुष्प अर्पित करने से मनोकामना पूर्ण होती है।
पंचक्रोश यात्रा पांडवों ने एक दिन में पूरी की
पांडवों ने जब पंचक्रोशी की यात्रा मणिकर्णिका कुंड से आरंभ की। उसके बाद कर्दमेश्वर महादेव से भीमचण्डी होते हुए शिवपुर पहुंचे थे जहां पांचों पांडवों ने मंदिर स्थापित कर चौथा पड़ाव निर्धारित किया था। मंदिर में द्रौपदी के साथ पांचों पांडवों की मूर्ति भी स्थापित है। कहा ये भी जाता है कि यहां के कुंड के अंदर सीढ़ियां भी थीं जो अब लुप्त हो गई हैं। महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहां अत्यधिक भीड़ होती है।