उन्होंने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, केंद्र सरकार एवं उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता लेकर 28 अगस्त 2018 को बाल शिशु गृह शुरू किया है। इसमें मऊ, बलिया, गाजीपुर और जौनपुर जनपदों में मिलने वाले लावारिस बच्चों को रखे जाने की व्यवस्था है। इसमें एक माह से एक साल तक के 15 बच्चे रह रहे हैं।
शेखर तिवारी ने बताया कि दो साल बीतने के बावजूद सरकारी फंड और मदद के नाम पर कुछ नहीं मिला है। बताया कि कई बार आर्थिक तंगी बढ़ जाने पर बैंक से लोन लेना पड़ता है, लेकिन वह अपने काम में शिद्दत से लगे हैं।
बताया कि सबसे अधिक समस्या बच्चों के इलाज में आती है। बच्चों के बीमार होने पर उन्हें स्थानीय चिकित्सकों के अलावा अक्सर जनपद मुख्यालय स्थित अस्पताल ले जाना पड़ता है। बताया कि इन चार जनपदों में लावारिस मिलने वाले शिशुओं का लेखा-जोखा केंद्र सरकार के पोर्टल पर फीड होता है।
इसके बाद कागजी कार्रवाई कर बच्चों को केंद्र पर लाकर रखा जाता है। बताया कि दो साल में इस केंद्र से सरकार की अनुमति से देश के विभिन्न राज्यों के नि:संतान दंपतियों ने 14 शिशुओं को गोद लिया है। इनकी देखभाल के लिए दो शिफ्ट में 12 सहयोगी और कर्मचारी लगे हैं। बच्चों के दूध, दवाई, कर्मचारियों के वेतन सहित अन्य पर महीने में औसतन एक लाख खर्च आता है। इसे जन सहयोग और अपने संसाधन से पूरा करना पड़ता है।