हिंदी की धरोहर काशी की सूजन परंपरा। स्वयं
जिला राजकीय पुस्तकालय में प्रसिद्ध समीक्षक शांतिप्रिय द्विवेदी और डॉ. शंभू नाथ सिंह के अवदान पर नरेंद्र नाथ मिश्र और डॉ. भुवनेश्वर द्विवेदी का व्याख्यान हुआ। नरेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि पं. शांति प्रिय द्विवेदी सही अर्थों में सर्वहारा साहित्यकार थे। उनकी गणना मुख्य रूप से निबंधकार एवं छायावादी समीक्षा के रूप में होती है लेकिन वे समर्थ कवि, उपन्यासकार, संस्मरणकार एवं आत्मकथा लेखक भी थे।
नवगीत के ध्वजवाहक डॉ. शंभू नाथ सिंह के योगदान की चर्चा करते हुए डॉ. भुवनेश्वर द्विवेदी ने कहा कि जब-जब जहां-जहां लोकगीत का उल्लेख या चर्चा होगी उसमें शंभू नाथ सिंह निश्चित रूप से रहेंगे। बिना शंभू नाथ सिंह के नवगीत के प्रारूप का चित्रण नहीं किया जा सकता। शंभू नाथ सिंह नवगीत के प्रणेता तथा संवाहक पुरुष हैं। उनका साहित्य भारतीय हिंदी साहित्य को प्रभावित करता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. शशि कला त्रिपाठी ने की। विशिष्ट अतिथि डॉ. राजीव कुमार सिंह रहे। विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दया निधि मिश्रा ने कहा कि हिंदी धरोहर की इस यात्रा का यह एकादश पुष्प है। मुझे विश्वास है कि यह यात्रा आगे चलती रहेगी। सरस्वती वंदना पंडित सिद्धनाथ शर्मा ने किया। संचालन सुनील नारायण उपाध्याय और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राम सुधार सिंह ने किया। समारोह में आनंद कृष्ण मासूम ने काव्य पाठ किया। इस अवसर पर शिवकुमार पराग, अत्रि भारद्वाज कविंद्र नारायण, हिमांशु उपाध्याय, पवन कुमार, संतोष प्रीत आदि मौजूद रहे।