अनोखी है पौराणिक मान्यता
मंदिर के सेवादार के अनुसार, देवी ब्रह्मचारिणी भगवती दुर्गा की नव शक्तियों में इनका दूसरा रूप माना जाता है। शास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि माता ब्रह्मचारिणी पूर्व जन्म में राजा हिमालय के घर मैना के गर्भ से उत्पन्न हुईं। देवर्षि नारद के कहने पर माता ब्रम्हचारिणी शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए जंगल में जाकर हजारों वर्ष केवल फल खाकर कठिन तपस्या की। पुनः शिव को विशेष प्रसन्न करने के लिए ब्रह्मचारिणी ने 3000 वर्ष तक वृक्षों से गिरे सूखे पत्तों को खाकर कठिन तपस्या की।
ब्रह्मचारिणी मां की उपासना एवं आराधना करने से भक्तों को अनेक प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती हैं, जैसे तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार इत्यादि की वृद्धि होती है। इनकी कृपा से भक्तों को सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है और जो बच्चे पढ़ने में कमजोर है उन्हें मां ब्रह्मचारिणी के दर्शन मात्र से जीवन के सभी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होती है एवं जीवन की अनेक प्रकार की परेशानियां भी समाप्त हो जाती हैं। मां का दर्शन करने के लिए भोर से ही भक्तो ने लाइन लगा ली थी।