सनबीम स्कूल की प्रधानाचार्य गुरमीत कौर ने कहा कि शुरुआत में बच्चे पढ़ाई को लेकर काफी चिंतित थे। कई में कोर्स पिछड़ने को लेकर भी अवसाद देखा गया। ऐसे में बच्चों को पढ़ाई के लिए मानसिक तौर पर काफी प्रयासों के बाद तैयार किया गया। अभिभावकों ने भी बच्चों को समय दिया। बच्चों की काउंसिलिंग कराई जा रही है। ऑफलाइन कोर्स शुरू होने के बाद जुड़ाव बढ़ाने के लिए गतिविधियों का आयोजन कराया जा रहा है।
सख्ती नहीं प्यार दिखाएं
मनोविज्ञानी डॉ. संतोष कुमार सिंह ने कहा कि कोरोना के बाद स्कूल खुलने पर बच्चों में अवसाद का स्तर बहुत ज्यादा था। ऐसे बच्चों की लगातार काउंसिलिंग की गई और उनके अंदर के भय को दूर किया गया। अभिभावकों को स्कूल खुलने के बाद बच्चों की गतिविधियों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। संक्रमण काल में बच्चों पर बेहतर करने का दबाव सबसे ज्यादा है। ऐसे में उनके साथ सख्ती के बजाय प्यार से व्यवहार करें।
कंपोजिट विद्यालय महमूरगंज की प्रधानाध्यापिका प्रीति त्रिवेदी ने कहा कि बच्चे लंबे समय से भौतिक पठन-पाठन से वंचित रहे, उन्हें विषय समझने में काफी परेशानी हुई। तब मैंने घर पर एक-एक विषय का रोचक वीडियो बनाकर बच्चों से साझा किया। इससे बच्चों को काफी मदद मिली, स्कूल आने के बाद भी रोचक तरीके और खेल खेल में टॉपिक को समझाने का प्रयास किया। काफी हद तक उन्हें कॉन्सेप्ट समझ आ रहे हैं।
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी राकेश सिंह ने कहा कि कोरोना काल में बच्चों का पढ़ाई की लय टूट गई है। रुचि बनाए रखने के लिए बेसिक स्कूलों में पढ़ाई की व्यवस्था में सुधार लाने की पहल की जा रही है। बच्चों में स्कू ल जाने का डर बना रहता है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, दाखिला लेने वाले बच्चों को तीन महीनों तक विशेष प्रशिक्षण मिलेगा। पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक बच्चे को शुरुआत में तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें दूसरे बच्चों के साथ खेलने और उठने-बैठने के लिए तैयार किया जाएगा।
पाठ पुराने पर मिलता है उपहार
बच्चों की किताबें पढ़ने और लिखने की आदत छूट गई थी। दोबारा से पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा करने के लिए बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत की। बच्चों कोल गृह कार्य देना शुरू किया। कहा कि जो बच्चा पूरा पाठ तैयार कर आएगा, उसे उपहार मिलेगा। इससे बच्चे में प्रतियोगिता की भावना तो जागृत हुई साथ ही उन्होंने अपनी पढ़ाई भी पूरी की। - रविंद्र सिंह, प्रधानाध्यापक, प्राथमिक विद्यालय, भिटारी
कोरोना की पहली और दूसरी लहर बच्चों के लिए काफी खतरनाक बताई जा रही थी। ऐसे में बच्चों को घर में कै द करके रखना मुश्किल था। घर में रहने से बच्चे चिड़चिड़े भी हो गए थे। फिर मैंने अपने बच्चे को दूसरे कामों में व्यस्त रखना शुरू किया। सुबह अपने साथ योग कराने के बाद शाम को दोनों छत पर खेलते थे। इससे उसे काफी अच्छा लगता था। बीच में उसे पढ़ाई भी करवाती थी। - श्वेता अग्रवाल
स्कूल न जाने और दोस्तों के साथ खेलने के लिए बाहर न जाने से बच्चों के व्यवहार में काफी बदलाव आ गया था। बच्चे या तो ज्यादा समय तक टीवी देखते थे या तो ज्यादातर गुमसुम बैठे रहते थे। उन्हें किसी चीज के लिए मना करती तो गुस्सा होते थे। इसे देख मैं भी उनके साथ खेलती थी, उन्हें अलग-अलग चीजें बनाकर देने का प्रयास करती थी। - स्वाति श्रीवास्तव