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पुलिस कमिश्नरेट के फिंगर प्रिंट कार्यालय में बदहाली के दाग

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पुलिस कमिश्नरेट कार्यालय से सटे अंगुष्ठ छाप (फिंगर प्रिंट) कार्यालय का अस्तित्व अब खतरे में है। 95 साल पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। अफसरों की अनदेखी और अव्यवस्था के चलते कार्यालय कभी भी ढह सकता है। जिलाधिकारी परिसर स्थित अंगुष्ठ छाप कार्यालय में पीपल के पेड़ जम गए हैं तो वहीं बारिश में छत भी टपकती है। कई बार फाइलें भीग जाती हैं।
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यहां सजायाफ्ता अभियुक्तों के फिंगर प्रिंट सुरक्षित रखे जाते हैं। इस ऑफिस से जो फिंगरप्रिंट लिए जाते है वह जांच के लिए एकांकी ब्यूरो लखनऊ भेज दिए जाते हैं। फिर दिल्ली स्थित दशांकी ब्यूरो भेजा जाता है जहां रिकार्ड सुरक्षित रहता है। जब कोई बड़ा अपराधी देश में कहीं पकड़ा जाता है तब लिए गए अंगुष्ठ छाप से शिनाख्त की जाती है। इस ऑफिस से जुड़े लोग घटनास्थल पर भी जाकर फिंगर प्रिंट लेते हैं। जब संदिग्ध पकड़े जाते हैं तब उनकी शिनाख्त लिए गए नमूने से की जाती है। फिंगर प्रिंट लावारिस शव का भी लिया जाता है। मिलान कराने पर यह पुष्ट होता है कि अमुक व्यक्ति कभी अपराधी या सजायाफ्ता तो नहीं रहा है। इस कार्यालय में 1925 से रिकॉर्ड रखे गए हैं। प्रभारी हेड कांस्टेबल शिव प्रताप सिंह और एक अन्य सहयोगी हैं, जो अभियुक्तों को सजा मिलने पर जेल में जाकर फिंगर प्रिंट डेल्टा टू डेल्टा लेते हैं, जिसमें आजीवन कारावास, फांसी और अन्य अपराधों में सजा पाए अपराधी होते हैं।
पीपल का पेड़ बना मुसीबत
ऑफिस अभियोजन से संचालित अंगुष्ठ छाप कार्यालय की स्थिति खराब है। दीवारें व दरवाजे जर्जर हैं। रंगरोगन छोड़िये, पुराने पंखे कभी भी जवाब दे सकते हैं। पीपल के पेड़ को कटवाने के लिए कई बार नाजिर को पत्र लिखा गया, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। बारिश के दिनों में छत से टपकने वाला पानी रजिस्टरों पर गिरता है।
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