आरोप लगाया कि उनके संघर्ष की कहानी को तोड़-मरोड़ कर किसान, बुनकर की जगह उनको बैंडबाजा वाला बना दिया गया। इतना ही नहीं, लाल बिहारी मृतक की जगह भरत लाल मृतक नाम बताया गया है। आरोप लगाया कि फिल्म एग्रीमेंट की कॉपी मांगने पर वह हीलाहवाली करते रहे। एक बार भी उन्हें फिल्म की कहानी नहीं सुनाई और न ही फिल्म दिखवाई। फिल्म रिलीज होने से पहले दिखाने से मना कर दिया। एग्रीमेंट की कॉपी फिर मांगने पर कहा गया कि कहानी का सारा अधिकार उनके पास है। उन्होंने आरोप लगाया कि सतीश कौशिक ने सौ रुपये के स्टांप पर हस्ताक्षर कराकर उनके संघर्ष की कहानी अपने नाम कर ली और उसका लाभ उठा रहे हैं।
18 साल बाद मुर्दा से हुए जिंदा
छह मई 1955 में जनपद आजमगढ़, ग्राम खलीलाबाद, थाना तहसील निजामाबाद में जन्म लेने वाले लाल बिहारी मृतक के पिता कृषि मजदूर थे। उनकी मौत के बाद अमिलो, थाना मुबारकपुर, तहसील सदर आजमगढ़ में उनका पालन पोषण हुआ। 30 जुलाई 1976 को उन्हें अभिलेखों में मृत घोषित कर दिया गया था। काफी संघर्षों के बाद 30 जून 1994 को वह अभिलेखों में दोबारा जिंदा हुए। तबसे वह लगातार अभिलेखों में मृत लोगों को जिंदा साबित करने की जंग लड़ते आ रहे हैं।