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विश्व धरोहर पर पड़ गए काले धब्बे, लिए गए नमूने

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सारनाथ। भगवान बुद्ध की निशानी के तौर पर सारनाथ में स्थित धमेख स्तूप पर मौसम की मार पड़ने लगी है। बौद्ध धर्म की इस वैश्विक धरोहर पर काले धब्बे उभर आए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की विज्ञान शाखा के अधिकारियों ने शुक्रवार को धमेख स्तूप पर पड़ने वाले काले धब्बों का परीक्षण किया और उसके नमूने भी एकत्र किए।
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गुप्त काल में निर्मित धमेख स्तूप पर मौसम के थपेड़ों का असर नजर आने लगा है। बारिश, धूप व बदलते मौसम ने स्तूप के पत्थरों की रंगत खराब करनी शुरू कर दी है। धमेख स्तूप के पत्थरों पर काले धब्बों तथा क्षीण हो रहे पत्थरों के अध्ययन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की विज्ञान शाखा के अधिकारी सारनाथ पहुंचे। उन्होंने धमेख स्तूप पर पड़ रहे काले धब्बों का अध्ययन व परीक्षण किया। केमिकल टेस्टिंग करने के बाद काले धब्बों के नमूनों को अपने साथ भी ले गए।
भारतीय पुरातत्व विज्ञान शाखा के निदेशक रामजी निगम ने बताया कि अभी धमेख स्तूप पर पड़ रहे काले धब्बों व क्षीण हो रहे पत्थरों के नमूने इकट्ठा किए जा रहे हैं। इस पर देहरादून स्थित भारतीय पुरातत्व प्रयोग प्रयोगशाला में अध्ययन किया जाएगा। उसके बाद शासन को इसकी रिपोर्ट भेजी जाएगी। अभी के अध्ययन में हमने यह पाया कि जो बाहर कालापन दिख रहा है, यह बाहर से काला नहीं पड़ रहा है बल्कि हो सकता है कि उस समय जब इसे बनाया गया हो तो पत्थरों को जोड़ने के लिए किसी न किसी प्रकार के केमिकल का प्रयोग किया गया होगा। अंदर से ही उसका रिसाव हो रहा है।
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बौद्ध धर्मावलंबियों का है पवित्र स्थल
भगवान बुद्ध की प्रथम धर्म उपदेश स्थली को देश-विदेश से देखने के लिए पर्यटक आते हैं। बौद्ध अनुयायियों के लिए यह स्थान एक पवित्र तीर्थ स्थल है। पुरातात्विक अवशेषों से यह ज्ञात होता है कि कभी यह खंडहर परिसर समृद्ध व सुनियोजित तरीके से बनाया गया मठ रहा होगा। इतिहास में दर्ज है कि भगवान बुद्ध द्वारा यहीं पर अपने पांच शिष्यों को प्रथम धर्म उपदेश दिया गया था। वहीं पर आज धमेख स्तूप स्थित है। लगभग बुद्ध के 250 साल बाद सम्राट अशोक ने जब बौद्ध धर्म अपनाया तब उन्होंने भगवान बुद्ध से संबंधित सभी स्थलों का सुंदरीकरण करवाया। इसी क्रम में सारनाथ में अशोक द्वारा धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ व धर्मराजिका स्तूप का निर्माण कराया गया। पुरातात्विक खंडहर परिसर में स्थित दोनों स्तूपों का निर्माण भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेषों के ऊपर हुआ था। जिनमें से धर्मराजिका स्तूप अब अवशेष मात्र ही बचा है।
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