वाराणसी। संत मोरारी बापू ने रविवार को मधुमास में राम रसायन घोला। स्वच्छता, सहजता और प्रेम पर विस्तार से रोशनी डाली। कहा कि देश में हर तरफ स्वच्छता की चर्चा हो रही है लेकिन बाहर की सफाई के लिए पहले भीतरी सफाई होनी चाहिए। बाहर-भीतर की सफाई के अंतर को भी उन्होंने स्पष्ट किया।
कहा कि बाहर की सफाई के प्रयासों की फोटो हो सकती है लेकिन भीतर की सफाई दिखाने के लिए कोई कैमरा काम नहीं कर सकता। इसके लिए सिर्फ रामकथा की प्रयोगशाला ही आधार बन सकती है।
अस्सी घाट के दक्षिणी हिस्से में भक्तों से खचाखच भरे पंडाल में सुबह साढ़े नौ बजे कथा आरंभ हुई। मोरारी बापू ने ‘मानस मधुमास’ में चार घंटे तक रामनाम के रस का संचार किया।
व्यास पीठ पर पहुंचने के बाद हर-हर महादेव के जयकारे लगने लगे। संत ने लोकहित के लिए समाज के अंतिम व्यक्ति से नाता जोड़ने का संदेश दिया। बताया कि गोस्वामी तुलसी दास रामनाम के जरिये समाज के अंतिम व्यक्ति तक जाना चाहते थे। उनके राम निषादराज, केवट और शबरी जैसे समाज के आखिरी पायदान पर खड़े लोगों तक गए भी थे।
यही लौकिक दृष्टि है। सहज भाव से बिना किसी भेदभाव के हर इंसान से प्रेम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि तर्कों में उलझकर ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए कि तीर तरकश से निकल जाए और पश्चाताप होने लगे। कहा कि सहजता ही समाधि का माध्यम है। सहज होकर सोना भी समाधि है। यह सहजता काशी के अलावा कहीं और नहीं मिल सकती। यही वजह है कि काशी में चाय-पान वालों को भी ‘गुरु’ कहा जाता है।