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संस्कृत विश्वविद्यालयों को मिले उपवेदों के अध्यापन का अधिकार

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नवीन शिक्षा नीति के आधार पर संस्कृत विश्वविद्यालय और महाविद्यालयाें को बहुविषयक बनाने की जरूरत है। नीति के कार्यान्वयन के लिए संस्कृत विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालयों की तैयारियों पर देश के 17 संस्कृत विश्वविद्यालय, संस्कृत भारती एवं भारतीय शिक्षण मंडल गुरुकुल प्रकल्प ने वर्चुअल बैठक में विचार विमर्श किया।
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सोमवार को उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कामत ने कहा कि संस्कृत भाषा में निहित विद्याओं को संस्कृत भाषा में ही पढ़ाया जाए। तब जाकर संस्कृत विश्वविद्यालयों को बहुविषयक बनाने का प्रयोजन सिद्ध होगा। अध्यक्षता करते हुए संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने कहा कि नई शिक्षा नीति को सभी संस्कृत विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में भारतीयता के साथ लागू किया जाएगा। संगोष्ठी का प्रारंभ डॉ. विजय कुमार शर्मा के वैदिक मंगलाचरण से हुआ। इस दौरान प्रो. रामचंद्र भट्ट, डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा, हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. ब्रजभूषण झा, प्रो. अमित कुमार शुक्ला, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. राम पूजन पांडेय, प्रो. महेंद्र पांडेय, डॉ. मधुसूदन मिश्रा, डॉ. राजा पाठक, डॉ. शरद कुमार नागर उपस्थित रहे।
गुरुकुलों से जुड़ें संस्कृत विश्वविद्यालय और महाविद्यालय
समापन सत्र में भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर ने कहा कि गुरुकुलों में आज भी पारंपरिक रीति से कलाओं का अध्यापन तथा अभ्यास कराया जा रहा है। संस्कृत विश्वविद्यालय को गुरुकुलों के संस्कृत महाविद्यालयों में संपर्क करने की आवश्यकता है। आधुनिक विज्ञान के अध्यापन के साथ-साथ संस्कृत विश्वविद्यालयों में लागू होने वाले पाठ्यक्रमों में भारतीयता की पूर्णता अपेक्षित है। आयुर्वेद, स्थापत्यवेद, धनुर्वेद तथा सभी कलाओं का अध्यापन संस्कृत महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालयों में होने के लिए अपेक्षित संसाधनों की तैयारी विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय और उनको कार्यान्वित करने के लिए अपेक्षित स्वातंत्र्य देने की तैयारी सरकार को करनी चाहिए।
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