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काशी केदुर्लभ ज्ञान को संरक्षित करेगा इंफोसिस

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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन में संरक्षित ज्ञान संपदा को संरक्षित करने का बीड़ा इंफोसिस ने उठाया है। प्राचीन पांडुलिपियों को संरक्षित करने के साथ ही भवन को संरक्षित करने की प्रक्रिया मार्च में शुरू होगी।
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100 साल पुराने सरस्वती भवन में भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य राशि संरक्षण के अभाव में खराब हो रही है। अमर उजाला की खबर के माध्यम से इंफोसिस की चेयरपर्सन सुधा मूर्ति को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल से इसको संरक्षित करने की मंशा जाहिर की। बातचीत में इंफोसिस फाउंडेशन ने सरस्वती भवन और उसकी पांडुलिपियों को संरक्षित करने के लिए मदद का आश्वासन दिया था। इंफोसिस ने पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए संस्कृतसंवधर्न प्रतिष्ठानम को जिम्मेदारी सौंपी है। प्रतिष्ठानम के प्रतिनिधि के. लक्ष्मीनरसिम्हन ने रविवार को सरस्वती भवन का निरीक्षण किया और पांडुलिपियों की वर्तमान स्थिति को देखा। कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ला ने बताया कि चार-पांच दिनों में संस्कृत विश्वविद्यालय और इंफोसिस फाउंडेशन के बीच सरस्वती भवन और पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए एमओयू किया जाएगा। सभी दस्तावेज तैयार हो चुके हैं।
दो चरणों में होगा काम, बनेगा फ्यूमिगेशन चैंबर
इंफोसिस फाउंडेशन सीएसआर प्रोजेक्ट के तहत दो चरणों में पांडुलिपि संरक्षण के लिए काम करेगा। एमओयू के अनुसार मार्च में संरक्षण के कार्य की शुुरुआत होगी। पहले चरण में 50 लाख रुपये से अत्यंत जर्जर अवस्था में हो चुकी पांडुलिपियों को संरक्षित किया जाएगा। उनके पुराने हो चुके कपड़े बदले जाएंगे और फ्यूमिगेशन चैंबर का निर्माण होगा। इससे पांडुलिपियों को नमी और कीड़ों से बचाया जा सकेगा। पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए तंजावुर और वृंदावन के विशेषज्ञों की टीम को चयनित किया गया है।
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परंपरागत रसासन का होगा इस्तेमाल
कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ला ने बताया कि पांडुलिपियों पर लगाए जाने कपड़ों पर कृत्रिम रसायन की जगह परंपरागत रसायनों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें लौंग, काली मिर्च, जायफल आदि का प्रयोग होगा।
खबर की ट्वीट का लिया संज्ञान
अमर उजाला में प्रकाशित खबर को पद्मश्री चमू कृष्ण शास्त्री ने ट्वीट किया था। इसके बाद सुधा मूर्ति और उनके पुत्र रोहन मूर्ति ने खबर को संज्ञान में लिया और इसको संरक्षित करने के लिए कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल से उन्होंने संपर्क किया।
सौ साल से भी अधिक प्राचीन धरोहर है सरस्वती भवन पुस्तकालय
संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में सरस्वती भवन पुस्तकालय को सौ साल से भी अधिक हो चुके हैं। 2014 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने भवन के जीर्णोद्धार के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के तहत शासन को एक करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन इस पर कोई पहल नहीं हो सकी।
देश भर की दुर्लभ पांडुलिपियों का है संग्रह
20वीं शताब्दी में पुस्तकालय भवन बनने के बाद देशभर से दुर्लभ पांडुलिपियों का संग्रह का काम चलता रहा। वर्ष 1980 तक यहां पांडुलिपियां देश के विभिन्न भागों से आती रहीं। वर्तमान में सरस्वती भवन पुस्तकालय में एक लाख 11 हजार 132 से अधिक पांडुलिपियां संरक्षित हैं।
एक हजार साल पुरानी है श्रीमदभागवतगीता
सरस्वती भवन पुस्तकालय में दुर्लभ पांडुलिपियों का भंडार है। इसमें हस्तलिखित एक हजार साल पुरानी श्रीमद्भागवत प्रमुख है। यह देश की प्राचीनतम पांडुलिपि है। इसी तरह स्वर्णपत्र आच्छादित, लाक्षपत्र पर कमवाचा (वर्मी लिपि) यहीं संग्रहित है। स्वर्णाक्षरयुक्त रास पंचाध्यायी (सचित्र) की सूक्ष्म कलात्मकता अनुपम है। यहां वेद, कर्मकांड, वेदांत, सांख्य, योग, धर्मशास्त्र, पुराणेतिहास, ज्योतिष, मीमांसा, न्याय वैशेषिक, साहित्य, व्याकरण व आयुर्वेद की दुर्लभ पांडुलिपियां रखी हैं। इसके अलावा बौद्ध, जैन, भक्ति, कला और संगीत के विषय भी संरक्षित किए गए हैं।
1914 में बना यह पुस्तकालय
सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना 1791 में कर्णघंटा मोहल्ले में हुई थी। वर्ष 1907 में प्रिंस ऑफ वेल्स के निरीक्षण के बाद संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में सरस्वती भवन का निर्माण हुआ जो वर्ष 1914 में पूर्ण हुआ। इसके बाद यह भवन विश्वविद्यालय में पूरी तरह से पुस्तकालय बन गया। विद्वान पं. गोपीनाथ कविराज पुस्तकालय के पहले पुस्तकालयाध्यक्ष बने।
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