संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक मुख्य भवन जल्द ही मंत्रों से गुंजायमान होगा। 167 साल पुराने भवन की जीर्णोद्धार का काम लगभग पूरा हो चुका है। मार्च से मुख्य भवन में कक्षाओं का संचालन शुरू हो जाएगा।
शासन ने ग्रॉथिक शैली में निर्मित 167 वर्ष पुराने इस भवन के जीर्णोद्धार के लिए विश्वविद्यालय को करीब 12 करोड़ रुपये का अनुदान दिया था। मार्च 2016 से मुख्य भवन का जीर्णोद्धार किया जा रहा है। चार सालों से इंटैक इस ऐतिहासिक इमारत को पुराने स्वरूप में लाने में जुटी हुई है। कला व शिल्पकारी की विशिष्टता समेटे हुए ग्रॉथिक शैली के मुख्य भवन का शिलान्यास दो नवंबर 1847 में महाराजा बनारस व ब्रिटिश सेना के मेजर मारखम किट्टो ने किया था। मेजर किट्टो की देखरेख में यह भवन 1852 में बनकर तैयार हुआ था।
167 वर्ष पुराना मुख्य भवन कलाकारी का बेजोड़ नमूना है। भवन की प्राचीनता के अनुसार ही उसका जीर्णोद्धार किया जा रहा है। गुलाबी पत्थरों का यह भवन अब अपने पुराने वैभव की ओर लौट रहा है। स्टोन और लकड़ी का काम हो चुका है। नए खिड़की दरवाजे भी बनाए गए हैं। सेंट्रल हाल की छत की भी मरम्मत हो चुकी है। कुलसचिव राजबहादुर ने बताया कि ऐतिहासिक भवन का जीर्णोद्धार अब पूर्ण होने वाला है। मार्च में यह भवन विश्वविद्यालय को प्राप्त हो जाएगा।
स्थानांतरित होगा पुरातात्विक संग्रहालय
मुख्य भवन में पुरातात्विक संग्रहालय को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव भी तैयार किया गया है। इसमें वेद, कर्मकांड, ज्योतिष, सोलह संस्कार, पारंपरिक वीथिका बनाने की योजना है। वेद व कर्मकांड वीथिका में हवन कुंडों के प्रकार, कर्मकांड में प्रयोग होने वाले उपकरणों का मॉडल बनाकर प्रदर्शित करने की योजना है।