कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने बताया कि सरस्वती भवन अब बेहद जर्जर हो चुका है। समय रहते अगर इसका जीर्णोद्धार नहीं हुआ तो यह कभी भी ध्वस्त हो सकता है। इसके साथ ही संस्कृत परंपरा को सहेजने वाली थाती और अमूल्य ज्ञानराशि वाली पांडुलिपियां भी नष्ट हो जाएंगी। इसलिए मैं अपील करता हूं कि सरकार, सामाजिक संस्थाएं या कोई भी व्यक्ति इसके संरक्षण के लिए आगे आएं।
एक लाख से अधिक हैं पांडुलिपियां
20वीं शताब्दी में पुस्तकालय भवन बनने के बाद देशभर से दुर्लभ पांडुलिपियों के संग्रह का काम चलता रहा। 1980 तक देश के विभिन्न भागों से पांडुलिपियां यहां आती रहीं। वर्तमान में सरस्वती भवन पुस्तकालय में एक लाख 11 हजार 132 से अधिक पांडुलिपियां संरक्षित हैं।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
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दुर्लभ पांडुलिपियों का भंडार
सरस्वती भवन पुस्तकालय में दुर्लभ पांडुलिपियों का भंडार है। इसमें हस्तलिखित एक हजार साल पुरानी श्रीमद्भागवत प्रमुख है। यह देश की प्राचीनतम पांडुलिपि है। इसी तरह स्वर्णपत्र आच्छादित, लाक्षपत्र पर कमवाचा (वर्मी लिपि) यहीं संग्रहित है। स्वर्णाक्षर युक्त रास पंचाध्यायी (सचित्र) की सूक्ष्म कलात्मकता अनुपम है। यहां वेद, कर्मकांड, वेदांत, सांख्य, योग, धर्मशास्त्र, पुराणेतिहास, ज्योतिष, मीमांसा, न्याय वैशेषिक, साहित्य, व्याकरण व आयुर्वेद की दुर्लभ पांडुलिपियां रखी हैं। इसके अलावा बौद्ध, जैन, भक्ति, कला और संगीत के विषय भी संरक्षित किए गए हैं। यह देवनागरी सहित बांग्ला, उड़िया, मैथिली, गुरुमुखी, शारदा, अरबी-फारसी लिपि में कागज, भोजपत्र, काष्ठ पत्र, शिलापत्र पर लिखे गए हैं। यही नहीं, गोविंद भट्ट कृत ऋग्वेद संहिता, भाष्य और श्रुति विकास, सायणाचार्य कृत ऋग्वेद संहिता भाष्य भी मौजूद है।
1914 में बना था पुस्तकालय
सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना 1791 में कर्णघंटा मोहल्ले में हुई थी। वर्ष 1907 में प्रिंस ऑफ वेल्स के निरीक्षण के बाद संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में सरस्वती भवन का निर्माण हुआ जो वर्ष 1914 में पूर्ण हुआ। इसके बाद यह भवन विश्वविद्यालय में पूरी तरह से पुस्तकालय बन गया। विद्वान पं. गोपीनाथ कविराज पुस्तकालय के पहले पुस्तकालयाध्यक्ष बने।