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साधकों ने जलाए अखंड दीप, सिद्धि की आराधना आरंभ

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गुप्त नवरात्र में प्रलय एवं संहार के देव महादेव एवं मां काली की पूजा का विधान है। साधक इस दौरान दस महाविद्याओं से गुप्त सिद्धि की कामना से व्रत-पूजन का अनुष्ठान करते हैं। प्रतिपदा पर साधकों ने कलश स्थापना और अखंड दीप के साथ गुप्त सिद्धि की साधना के लिए पूजन आरंभ कर दिया। गुप्त नवरात्र होने के कारण इसके सभी विधान गुप्त ही होते हैं।
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बुधवार से गुप्त नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही अखंड दीप भी जलाए गए। विधि विधान से पूजन के उपरांत रात्रि में दस महाविद्याओं का पूजन हुआ। प्रथम दिन मां काली की आराधना से संपन्न हुई। दूसरे दिन तारा देवी, तीसरे दिन त्रिपुर सुंदरी, चौथे दिन भुवनेश्वरी, पांचवें दिन माता छिन्नमस्ता, छठवें दिन त्रिपुर भैरवी, सातवें दिन मां धूमावती, आठवें दिन मां बगलामुखी और नौवें दिन मातंगी व कमला देवी की पूजा होती है।
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के सदस्य पं. दीपक मालवीय ने बताया कि देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्र में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्र विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल व महाकाली से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं।
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गुप्त नवरात्र की प्रमुख देवियां
गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या तंत्र साधना के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं।
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