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शहर से अधिक 'सयाने' हैं ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता

Fri, 03 Mar 2017 06:02 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
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एसी कमरे में बैठकर चाय-काफी के साथ राजनीति के समीकरण बतियाना, बनाना और बिगाड़ना एक बात है। वहीं सर्दी-गर्मी और बरसात की परवाह किए बिना लोकतंत्र के यज्ञ में वोट की आहुति देना बिल्कुल अलग बात है। लोकतंत्र में सरकार बनाना, हटाना मतदाताओं की ही शक्ति है और ग्रामीण क्षेत्र के वोटर इसे जानते ही नहीं मानते भी हैं।

बीते दो चुनाव इसे साबित करते हैं। अगर वाराणसी की बात करें तो 
2007 में सबसे अधिक मतदान गंगापुर विधानसभा (अब शिवपुर) सीट पर हुआ। 2012 में भी करीब 64 फीसदी मतदान के साथ शिवपुर जिले में आगे रहा।

कम वोटिंग की बात करें तो 2012 में शहर उत्तरी और कैंट विधानसभा में सबसे कम वोट पड़े। इसके बाद शहर दक्षिणी रहा, जबकि शिवपुर समेत अजगरा और रोहनिया जिसके परिसीमन में ग्रामीण क्षेत्र सबसे अधिक हैं, वो वोटिंग में फर्स्ट डिवीजन रहा।
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2007 में चिरईगांव, गंगापुर और कोलसला में शहर दक्षिणी, उत्तरी और कैंट से ज्यादा वोट बरसे। 2012 के चुनाव में शहरी विधानसभा सीटों पर मतदाताओं ने दम-खम तो दिखाया लेकिन देहात के मतदाताओं को पीछे नहीं कर पाए। 

बोलते आंकड़े ( वाराणसी जिला)
2012
शिवपुर (63.73:, सेवापुरी (62.9), रोहनिया (61.3), अजगरा (60.96), पिंडरा (56.860, शहर दक्षिणी (56.25), कैंट (52.79), शहर उत्तरी (52.79)। 

2007
गंगापुर (49.61), कोलअसला (47.66), चिरईगांव (39.95), शहर उत्तरी (31.87), कैंट (31.58), शहर दक्षिणी (31.18)
(नोट: आंकड़े प्रतिशत में हैं। 2007 में विधानसभा क्षेत्रों की संख्या छह थी, जबकि परिसीमन के बाद 2012 में यह संख्या आठ हो गई थी।) 
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