डॉक्टर महोबिया के मुताबिक वर्ष 2016 में ही इस शोध को करने की हरी झंडी मिल गई थी। इस्पात मंत्रालय की ओर से 2 करोड़ 84 लाख रुपए का फंड भी मिला था। पिछले साल अप्रैल में ही इसका पेटेंट भी फाइल किया जा चुका है। इसका प्रयोग शरीर के अनुकूल होने के कारण स्टेंट, पेसमेकर,वॉल्व आदि बनाने में भी किया जा सकता है। उधर, आईआईटी के निदेशक प्रोफेसर प्रमोद जैन ने बताया कि इस शोध को आम जनमानस के लिए उपयोगी बताया और कहा कि इसमें अलग-अलग इस्पात निर्माताओं और प्रत्यारोपण उपकरण बनाने वाले उद्योगों ने भी अपनी रुचि दिखाई है।