Varanasi News: शोध में यह भी बताया गया है कि 99 प्रतिशत ऐसे डीएनए होता हैं, जिनका कार्य ही पता नहीं चल पाता है। उनमें से 15 ऐसे मिले हैं, जिनमें बैक्टीरिया या वायरस के जीन मिले हैं। यह भी देखा गया कि कि यह जीन कब मानव शरीर में आए। इस बारे में और अध्ययन चल रहा है।
एक प्रजाति से दूसरे प्रजाति में अनुवांशिक डीएनए का जाना पित्त की थैली के कैंसर का कारक हो सकता है। आईएमएस बीएचयू के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग और जनरल सर्जरी विभाग में हुए एक शोध में इसकी जानकारी मिली है।
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परिणाम में यह तथ्य सामने आया है कि मनुष्य की क्रमागत उन्नति के दौरान उसके जीन में बैक्टीरिया और वायरस के जीन के कुछ हिस्से भी शामिल हो गए हैं। जो लाखों साल से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते है। ये डीएनए के उन हिस्सों मैं है, जिन्हें अब तक जंक डीएनए समझा जाता था और ऐसा सोचा जाता था कि इनका कोई कार्य नहीं है क्योंकि इन हिस्सों से प्रोटीन नहीं बनते हैं।
आईएमएस बीएचयू सर्जरी विभाग के प्रो.वीके शुक्ल, सर्जिकल आंकोलॉजी विभाग के प्रो. मनोज पांडेय ने के निर्देशन में जो शोध हुआ है। उसमें सर्जिकल आंकोलॉजी की शोध छात्रा रूही दीक्षित और मोनिका राजपूत भी है। इसका प्रकाशन भी रिसर्च जर्नल में हुआ है।
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प्रो. मनोज पांडेय का कहना है कि बैक्टीरिया या वायरस इन्फेक्शन होने पर इन जीन के सक्रीय होने की सम्भावना होती है, जो मूल रूप से बैक्टीरिया या वायरस को मनुष्य के अंदर रहने और बढ़ने में सक्षम बनाते हैं।
इसके साथ-साथ ये मनुष्य के सेल को अनियंत्रित बढ़ने, इम्यून सिस्टम से बचने और सेल को मरने से रोक सकते हैं। अगर यह होता है तो नार्मल सेल कैंसर में तब्दील हो सकता है। ऐसा पहली बार हुआ है, जहां से परिकल्पना की गयी है कि कैसे बैक्टीरिया और वायरस एक नार्मल सेल को कैंसर में तब्दील कर सकते हैं।