सुबह जगते ही कौवों की कांव कांव अब नहीं सुनाई देती। पितृपक्ष में भी कौवे देखने को नहीं मिल रहे हैं। कौवों की इस घटती संख्या को देखते हुए पर्यावरणविद भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में ही सरंक्षण को लेकर कोई उपाय नहीं किया गया तो यह भी विलुप्त हो जाएंगे।
लगातार पेड़ों की हो रही अंधाधुंध कटाई, बढ़ते जा रहे कंक्रीट के जंगल का असर पर्यावरण पर तो पड़ ही रहा है, पशु पक्षी भी प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही वर्तमान में बदलते खान पान और लगातार खेतों में हो रहे कीटनाशकों के प्रयोग से आम आदमी के शरीर के अलावा पशु पक्षियों का जीवन चक्र भी प्रभावित हो रहा है।
इसका सबसे अधिक पक्षियों में गौरैया और कौवों पर देखने को मिल रहा है। गौरैया को तो लोगों ने संरक्षण करना शुरू कर दिया लेकिन कौवों की जनसंख्या लगातार कम होती चली जा रही है। यही स्थिति रही तो कौवे भी गिद्घ की तरह गायब हो जाएंगे।
बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि इसके पीछे कई कारण हैं। इसमें एक तो पेड़ों की कटाई तो है ही, क्योंकि ये पेड़ों की खोह में ही अपना घोसला बनाते हैं। वहीं दूसरा फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए उपयोग किए जा रहे कीटनाशकों से वे खेतों में पानी पीने के चलते उनका प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है।