सावन में अगर सैंया परदेस में हों तो पुरवा सन-सन बेधने लगती है। कोयल की मधुर -मीठी बोली नहीं सुहाती। कोयल की कूंक सौतन की तरह तन को सुलगा देती है। सावन के इस विरह को लोक गीतों में सहज तरीके से व्यक्त किया गया है। कहीं रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे...के जरिए विरह वेदना प्रगट की गई है तो कहीं पूर्वी में -जेकर पियवा गइल परदेस सखी/ ओकर ससुरा से नीक नइहरवे बा/बेधे पुरवा पलंग पे सोहागिन होखे/डंसे कुसुम के जइसे नागिन होखे... जैसी पंक्तियां लोक मानस में प्रेम -विरह को दर्शाती हैं। आज के अंक में सावन, कजरी और विरह को लेकर प्रस्तुत है भोजपुरी लोक गीतों के सम्राट भरत शर्मा व्यास के अहसास।
बलिया से बक्सर तक या फिर भोजपुर- आरा से छपरा तक के गांवों में लोकप्रिय पूर्वी -छपरहिया में विरह का जो भाव कवियों ने व्यक्त किया है, कमोवेश वही बनारस, मिर्जापुर की कजरी में भी है। यह कहना है भोजपुरी के जाने माने गायक भरत शर्मा व्यास का। वह कहते हैं कि जिनका पति परदेश रहता है,उन औरतों के लिए, सावन की बूंद जब आंगन- द्वार या तन पर पड़ती है तब वह अंगार की तरह लगती है। वह भोजपुरी में बताते हैं कि-पुरवइया हावा होखे, धीरे-धीरे बहत होखे, गवनहरी मेहरारू होखे, रात्रि के समय होखे, आ ऊ पलंग पे होखे त ओकरा के कइसन बुझाई? रउआ तनिक सोचीं। वह बताते हैं कि सावन इतना हरा-भरा होता है कि चारों तरफ, खेत, सीवान में उसकी हरियाली छा जाती है- ऐसे में कजरी गाई जाने लगती है-सखि रे सावन जब से बरसे पिया बिन मनवां तरसे ना.../ जब -जब बूंद परेला तन पर, होत न बाटे काबू मन पर/ कइसे निकली घर से ना...। इस महीना में धान रोपने वाली महिलाएं गाती हैं- परदेसवा में जहिया से गइलें पिया हमरा के भुलइले पिया ना/ बड़ा धइनी हाथ -गोड़/गइले हमरा के छोड़/ कवन सवतिन के रूप पर लुभइले पिया...। झूले पर इस तरह की कजरी सखियों संग गाकर वह उस विरह को भुलाती हैं कि किसी तरह समय कट जाए...।
इस महीने में अपने-अपने अंदाज में जो भी गाया जाता है वह कजरी है। बनारसी कजरी, मिर्जापुरी कजरी, इलाहाबाद, वृंदावन की कजरी की सिर्फ गायन शैलियां अलग होती हैं, भाव एक ही होते हैं-वह लखनऊ के आसपास गाई जाने वाली कजरी गुनगुनाते हैं-घहरे बदरिया बरसे हमरी अंटरिया रामा, हरी -हरी अइले नाहीं घरवा मोर संवरिया रे हरी...। वह कहते हैं कि इस दौर की औरतों के आगे बहाना नहीं चलता। उनकी अगर कोई चाहत है तो यह कहने से काम नहीं चलेगा कि कारखाना बंद हो गया है या मुझे ड्यूटी नहीं मिल रही है। उसकी पसंद का सामान लाकर देना ही पड़ेगा...। नहीं तो वह समझेगी कि हमको मानते नहीं हैं। वह बताते हैं कि मकई के खेत में तीन महीने का मचान भी परदेस ही बन जाता है। जब तक मकई की फसल कट नहीं जाती , तबतक प्रियतम को मचान पर ही रहना पड़ता है। लोकगीतों में उस मचान का भी बखान परदेस के ही रूप में किया गया है। वह गीत सुनाते हैं-सुतहीं के रहे जब खेत-खरिहाने, गवन काहे ले अइला हम पूछ तानी...।