संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में वेद, कर्मकांड, वेदांत, सांख्य, योग, धर्मशास्त्र, पुराणेतिहास, ज्योतिष, मीमांसा, न्याय वैशेषिक, साहित्य, व्याकरण व आयुर्वेद की दुर्लभ पांडुलिपियां रखी हैं।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में दुर्लभ पांडुलिपियां खराब होती जा रही हैं। अब इनके संरक्षण की कवायद तेज हो गई है। इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने शासन को 1.31 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा है। पांडुलिपि अनुसंधान परियोजना के तहत यह काम कराया जाएगा। विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन स्थित पुस्तकालय में इस समय 1,11,132 दुर्लभ पांडुलिपियां रखी गई हैं।
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काफी पुरानी होने की वजह से यह खराब होती जा रही हैं। अब विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी की ओर से जो प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, उसमें इन पांडुलिपियों के संवर्धन के लिए लाल कपड़ों को एक विशेष प्रकार के केमिकल का लेप लगाकर रखे जाने की जानकारी दी गई है। इसके साथ इनका प्रकाशन भी कराया जाना है। कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने बताया कि संरक्षण के लिए गठित समिति ने ही 1.31 करोड़ का प्रस्ताव शासन को भेजने की स्वीकृति दी है।
सरस्वती भवन पुस्तकालय में दुर्लभ पांडुलिपियों का भंडार है। इसमें हस्तलिखित एक हजार साल पुरानी श्रीमद्भागवत प्रमुख है। कुलपति ने बताया कि यह देश की प्राचीनतम पांडुलिपि है। इसी तरह स्वर्णपत्र आच्छादित, लाक्षपत्र पर कमवाचा (वर्मी लिपि) यहीं संग्रहित है।
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स्वर्णाक्षरयुक्त रास पंचाध्यायी (सचित्र) की सूक्ष्म कलात्मकता अनुपम है। यहां वेद, कर्मकांड, वेदांत, सांख्य, योग, धर्मशास्त्र, पुराणेतिहास, ज्योतिष, मीमांसा, न्याय वैशेषिक, साहित्य, व्याकरण व आयुर्वेद की दुर्लभ पांडुलिपियां रखी हैं। इसके अलावा बौद्ध, जैन, भक्ति, कला और संगीत के विषय भी संरक्षित किए गए हैं।