महंत आवास पर गौरा का शृंगार।
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संजीव रत्न मिश्र ने शृंगार एवं आरती उतारी। आरती भोग के बाद गवनहरियों और परिवार की महिलाओं ने मिलकर मंगल गीत गाए। माता गौरा की रजत प्रतिमा के समक्ष दीप जला कर ढोलक की थाप और मंजीरे की खनक के बीच महिलाओं ने चुमावन की रस्म भी अदा की। साठी क चाउर चुमीय चुमीय...., मनै मन गौरा जलाए जब चाउर चुमाए..., गौरा के लागे ना नजरिया कजरवा लगाय द ना...जैसे पारंपरिक गीतों के गायन का क्रम रात्रि नौ बजे तक चला।
इसके बाद सुहागिनों की अंचरा भराई की गई। महंत परिवार की महिलाओं ने गवनहरियों के आंचल में अक्षत, गुड़, हल्दी, खड़ी सुपाड़ी और दक्षिणा डाल कर उनकी विदाई की। 22 मार्च को सायं काल तेल हल्दी की रस्म निभाई जाएगी। गौरा का गवना कराने के लिए रंगभरी एकादशी की तिथि से एक दिन पूर्व 23 मार्च को बाबा का ससुराल आगमन होगा।