राजशाही वेश में हाथी पर सवार होकर पहुंचे काशीराज के प्रतिनिधि अनंत नारायण सिंह
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गुरु वशिष्ठ राजा को धीरज रखने के लिए कहते हैं। पुत्र प्राप्ति के लिए राजा दशरथ श्रंगी ऋषि के साथ अग्नि देव की पूजा करते हैं। अग्नि देव तीनों रानियों को पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं । भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघभन के जन्म के बाद ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देने के साथ नगर में गाना बजाना शुरू हो गया। अयोध्या में घी के दीये जलाए जाते हैं। गौहारिन को बुलाकर सोहर गवाया जाता है। दशरथ ने गुरु वशिष्ठ को बुलाकर पुत्रों का नामकरण कराया। फिर चारों पुत्रों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया गया।
रामनगर की रामलीला के दूसरे दिन उमड़ी भीड़
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चारों भाई गुरु से शिक्षा ग्रहण करने के लिए उनके आश्रम में चले जाते हैं और अल्प समय में ही समस्त विद्या सीख लेते हैं। वहां से आने के बाद वे पिता की आज्ञा से शिकार खेलने निकले और मृग का शिकार करके साथ ले आए, उसे अपने पिता दशरथ को दिखाते हैं, जिस पर दशरथ बड़े ही प्रसन्न होते हैं। यहीं पर चारों भाइयों की आरती के बाद दूसरे दिन की रामलीला को विराम दिया जाता है।