जौं मम चरन सकसि सठ टारी, फिरहिं रामु सीता मैं हारी। सुनहु सुभट सब कह दससीसा, पद गहि धरनि पछारहु कीसा। अर्थात अंगद ने कहा अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्री रामजी लौट जाएंगे, मैं सीताजी को हार गया। रावण ने कहा- हे सब वीरों! सुनो, पैर पकड़कर बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दो। इंद्रजीत समेत अनेक राक्षस पूरे बल से झपटे, लेकिन पैर नहीं हिला सके।
बृहस्पतिवार को रामनगर की रामलीला में 21वें दिन श्रीराम का सेना सहित सिंधु पार गमन, सेना वर्णन, सुबेल गिरी विश्राम और अंगद विस्तार की लीला हुई। भरी सभा में अंगद का पांव तक नहीं हिला पाने वाले राक्षस राज रावण ने श्रीराम की वानरी सेना को परास्त करने के लिए राक्षस योद्धाओं से मंत्रणा शुरू कर दी।
मंदोदरी के लाख समझाने पर भी दंभ से चूर दशानन को प्रभु श्री राम की ताकत का अंदाजा नहीं है। उसने फैसला किया कि वह बिना युद्ध के सीता जी को वापस नहीं करेगा। युद्ध के लिए दशानन की हुंकार के बाद लंका में राक्षसी सेना हरकत में आ गई। उधर, अंगद के वापस लौटने के बाद वानरी सेना जय श्रीराम की जय-जय कार के साथ लंका पर चढ़ाई के लिए तैयारी हो चुकी है।