सीता स्वयंवर की घड़ी सोमवार की रात रामनगर के जनकपुर मैदान में कई दिलचस्प नजारों के साथ यादगार बन गई। पंचलाइट की रोशनी में राजाओं के मुकुट की चमक निखरती रही तो मशाल के बीच रामायणियों के मृदंग, झांझ गूंजे। जनक की रंगशाला में रखे शिव के पिनाक को रावण, सहस्त्रबाहु समेत अनेक राजा जहां हिला न सके, वहीं लीला प्रमियों के हर हर महादेव के जयघोष के बीच राम ने उसे एक हाथ से उठाया तो हर्षध्वनि गूंजने लगी। सटीक सिग्नल पर एक तरफ राम ने पिनाक तोड़ा, वहीं महज 50 मीटर दूर पीएसी के मैदान में जंग बहादुर ने तोप दागी तो लगा जैसे धरती कांप गई हो....।
नृप भुजबलु बिधु सिवधनु राहू/गरुअ कठोर बिदित सब काहू/रावनु बानु महाभट भारे/देखि सरासन गंवहिं सिधारे/भूप सहस दस एकहिं बारा/लगे उठावन टरइ न टारा/सब नृप भए जोगु उपहासी/जैसे बिनु बिराग संन्यासी...। धनुष यज्ञ की लीला देखने के लिए काशिराज अनंत नारायण सिंह शाही बग्घी से नहीं निकले। पीएसी गेट के सामने पहुंचे तो लाल, पीला साफा बांधे रामायणी सड़क पर ही पीढ़े पर बैठकर स्वयंवर की चौपाई का पाठ करने लगे। फिर लीला यहां से जनकपुर के मैदान में पहुंची। वहां राजा जनक प्रण कर बैठे थे कि जो शिव का पिनाक तोड़ेगा उसी के साथ सीता का विवाह होगा।
हजारों के जन सैलाब के बीच जनक की रंगशाला में सजाकर रखे पिनाक को तोड़ने के लिए हाथी पर सवार होकर राजाओं की सवारी पहुंचने लगी। जनक के यज्ञ मंडप में काशिराज गद्दी पर बैठे। सहस्त्रबाहु (बाड़ासुर) आैर रावण हाथियों से उतरे और सीधे रंगशाला में पिनाक तोड़ने की मशक्कत करने लगे। रावण शिव के पिनाक को हिला तक नहीं सका। इसी तरह अन्य राजाओं से भी पिनाक रत्ती भर टस मस नहीं हुआ। जनक निराश होकर विलाप करने लगे।
उनके माथे पर चिंता छा गई कि कहीं सीता कुंवारी न रह जाए। तबतक रघुवंश के राजकुमारों राम, लक्ष्मण से नहीं रहा गया। लक्ष्मण बोल पड़े- रघुबंसिन्ह महुं जहं कोउ होई/तेहिं समाज अस कहइ न कोई...। इसके बाद विश्वामित्र की आज्ञा लेकर रंगशाला में राम पहुंचे। राम के रंगशाला पहुंचते ही हर हर महादेव के जयकारे गूंजने लगे। सीता उन्हें देख संकुचा रही थीं। क्षण भर में राम के छूते ही पिनाक टूट गया और सूर्य का अश्व रथ उत्तरायण हो गया। उधर, शिव का धनुष टूटने की खबर मिलते ही परशुराम कुपित हो गए। परशुराम-लक्ष्मण संवाद की दिलचस्प लीला देखने के लिए मैदान लीला प्रेमियों से खचाखच भरा रहा।