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जिस्म का जकात है रोजा, आखिरी अशरे के इस्तकबाल के लिए तेज हुई इबादत

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रमजान का दूसरा अशरा भी अब मुकम्मल होने की तरफ बढ़ चला है। ऐसे में आखिरी अशरे के इस्तकबाल के लिए अब इबादतों का सिलसिला तेज हो चुका है। पांचों वक्त की नमाज के साथ ही कुरान की तिलावत भी शिद्दत से की जा रही है।
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शुक्रवार को रोजेदारों ने अस्पताल में भर्ती मरीजों की सलामती के लिए दुआओं के साथ ही जरूरतमंदों एवं पड़ोसियों तक मदद भी पहुंचाई। इफ्तारी के समय दुआख्वानी में रोजेदारों ने खुदा से इल्तिजा करते हुए कहा कि कोरोना महामारी से निजात दिलाएं और अस्पतालों में इलाज कराने वाले सलामती से घर लौटें। समाज में फैली महामारी के डर और बेचैनी का हल तलाशने के लिए रोजेदार परवरदिगार की बारगाह में रहमत की तलब कर रहे हैं। हाजी फरमान हैदर ने बताया कि रमजान का चांद होते ही शैतान गिरफ्तार कर लिया जाता है और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। मुश्किलकुशा हजरत अली फरमाते हैं कि जब रोजेदार इफ्तार के वक्त दुआ करता है तो वो जरूर कुबुल होती है और रोजा जिस्म की जकात है। परवरदिगार फरमाता है कि माहे रमजान कितना बरकतों और रहमतों का महीना है इसका अंदाजा बंदा इसी से लगा ले कि इस महीने में हमने दुनिया की सबसे मुकद्दस किताब कुरान मजीद नाजिल फरमाया है।
छठवें इमाम जाफर सादिक ने फरमाया है कि जिन चीजों से रोजा टूटता है उसमें झूठ, गीबत, चुगलखोरी, दो मोमिन के बीच लड़ाई कराना, किसी के लिए गलत नजर रखना, झूठी कसम खाना शामिल है। रोजा तकवे का सबब और अल्लाह की नजदीकी हासिल करने का जरिया है। रोजा जहन्नुम से बचाने की ढाल है और जन्नत में दाखिले होने का जरिया है।
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