इनकी ज्वाइनिंग 13 कुमाऊं रेजीमेंट में हुई और पहली पोस्टिंग सियाचिन ग्लेशियर में की गई। तीन महीने बाद सियाचिन ग्लेशियर से नीचे आने के बाद 1999 में कारगिल की जंग शुरू हो गई। जहां इनकी पल्टन को कारगिल युद्ध में भेज दिया गया। यहां उन्होंने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों से कड़ा मुकाबला किया और जंग में लड़ते हुए 30 अगस्त 1999 को शहीद हो गए।
उनके शहीद होने के बाद उनके गांव में सरकार की ओर से शहीद पार्क का निर्माण कराया गया, जहां शहीद रामसमुझ यादव की भव्य आदमकद प्रतिमा स्थापित है। प्रतिवर्ष 30 अगस्त को यहां पर उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है। उनके छोटे भाई प्रमोद यादव प्रतिवर्ष कारगिल विजय दिवस पर अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से आयोजित रक्तदान शिविर में रक्तदान जरूर करते हैं।