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Ram Mandir: प्राण प्रतिष्ठा..कहानी काशी से, शंकर की नगरी में रोम-रोम बसते हैं राम, काशी में हैं 101 विग्रह

Fri, 05 Jan 2024 11:41 AM IST
किरन रौतेला आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी

सार

काशी खंड के अनुसार बाबा विश्वनाथ के प्रिय सखा श्रीहरि विष्णु कहते हैं, हे! अविमुक्त! तुम्हारे क्षेत्र में सबको मुक्ति मिलती है। काशी में मैं समस्त पाषाण-प्रतिमाओं में विराजमान हूं।
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राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कण-कण शंकर की नगरी के रोम-रोम में राम बसते हैं। संपूर्ण काशी शिवमय ही नहीं राममय भी है। पंचक्रोशोत्मक काशी भगवान शिव का शाश्वत लिंग और ज्योति स्वरूप मानी जाती है। शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के आराध्य प्रभु श्रीराम और भगवान शिव के आराध्य भगवान राम हैं। संपूर्ण संसार जहां विश्वेश्वर को पूजता है, वहीं स्वयं विश्वेश्वर मुक्तिदायक अविमुक्तेश्वर लिंग को पूजते हैं।

काशी खंड के अनुसार बाबा विश्वनाथ के प्रिय सखा श्रीहरि विष्णु कहते हैं, हे! अविमुक्त! तुम्हारे क्षेत्र में सबको मुक्ति मिलती है। काशी में मैं समस्त पाषाण-प्रतिमाओं में विराजमान हूं। काशी क्षेत्र में नारायण रूप में मेरे पांच सौ विग्रह, जलाशयन रूप में एक सौ, कच्छप रूप में तीस, मत्स्य रूप में बीस, गोपाल रूप में 108, बौद्ध रूप में सहस्र, परशुराम रूप में 30 विग्रह और राम-रूप में 101 विग्रह हैं। मुक्तिमंडप (ज्ञानेश्वर मीरघाट क्षेत्र ) के मध्य में मैं विष्णु रूप में अकेला ही हूं।

काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का कहना है कि शिवपुराण के अनुसार पूर्व में किसी ने भी किसी के लिंग की स्थापना नहीं की थी। किसी को इसकी जानकारी भी नहीं थी। भगवान शिव ने सर्वप्रथम काशी में शिवलिंग के रूप में अपने इष्ट भगवान राम को स्थापित किया। भगवान शिव कहते हैं कि मेरे लिंग पूजन में अविमुक्तेश्वर लिंग अर्थात भगवान राम ही प्रधान लिंग हैं। इसके बाद ही ब्रह्मा, विष्णु समेत सभी देवी-देवताओं और ऋषियों ने लिंगों की स्थापना की।

बीएचयू के प्रो. माधव जनार्दन रटाटे व केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा का कहना है कि काशी में विराजमान अयोध्यापुरी में भगवान रामेश्वर में सीतापति राम स्वयं वास करते हैं। उनके द्वारा स्थापित रघुनाथेश्वर लिंग काशी में ही है। भगवान शिव अंत समय में मरने वालों को रामनाम का तारक मंत्र देकर ही मुक्त करते हैं।

काशी में विराजमान हैं तीनों युग

शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव की त्रिशूल पर स्थित काशी देहधारियों को तीनों ऋणों से मुक्त करती है। काशी को आप जिस रूप में देखेंगे, उसी रूप में नजर आती है। काशी में सतयुग, त्रेता और द्वापर युग समाहित हैं। त्रेतायुग में इक्ष्वांकु वंश का काशी प्रेम राजा इक्ष्वांकु से प्रारंभ होकर भगवान राम तक नजर आता है। सभी शिवस्वरूप में काशी में विराजमान हैं।

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ब्रह्महत्या के पापों से मुक्त करते हैं अविमुक्तेश्वर

अविमुक्त काशी सीमा पूर्व में मणिकर्णिकेश्वर, दक्षिण में ब्रह्मेश्वर, पश्चिम में गोकर्णेश्वर और उत्तर में भारभूतेश्वर तक फैली है। इतना स्थान अविमुक्तक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ और महाफलदायक है। तीर्थयात्री अविमुक्त क्षेत्र की यात्रा और अविमुक्तेश्वर के दर्शन से ही ब्रह्महत्या के पापों से छूट जा

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