श्मशान घाट के व्यवसायियों की मानें तो आम तौर पर सामान्य दिनों में 50 से 80 शवों की अंत्येष्टि होती है। लेकिन, मौसम के इस बदलाव ने मौतों की संख्या अचानक बढ़ा दी है। बनारस के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट से लेकर हरिश्चंद्र समेत अन्य श्मशान घाटों पर शवों की संख्या बढ़ी हैं। यहां शव लेकर आने वालों को दो से तीन घंटे इंतजार के बाद ही शव जलाने का मौका मिल रहा है।
दाह संस्कार के लिए महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर मुश्किलों का सामना भी करना पड़ रहा है। चिलचिलाती धूप में न छांव है और न पानी की मुक्कमल व्यवस्था। शाम के समय स्थिति और ज्यादा विकट हो रही है। दिन में धूप होने के कारण ज्यादातर लोग शाम चार बजे के बाद शव लेकर पहुंच रहे हैं। इसके चलते लोगों को लंबा इंतजार भी करना पड़ रहा है। यहां लोगों को चिता जलाने के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ रही है। शवदाह में लगने वाले लकड़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं।
'काश्यां मरणात् मुक्ति', ऐसी मान्यता है की काशी में मृत्यु से मुक्ति मिलती है। धार्मिक मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर मुखाग्नि से मृतक को शिवलोक की प्राप्ति होती है। काशी मोक्ष की नगरी होने के कारण पूरे पूर्वांचल के जिलों से यहां अंतिम संस्कार के लिए शव लाए जाते हैं। मणिकर्णिका घाट पर चिता की अग्नि कभी बुझती नहीं है।