सूक्ष्म जीवों को मिलेगा पुनर्जीवन
इस प्रोटोकॉल के लागू होने के बाद गंगा और उसके इकोसिस्टम के साथ ही मछलियों सहित सूक्ष्म जीवों को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि मछलियों में माइक्रो प्लास्टिक की मात्रा बहुत कम हो। साथ ही इससे गंगा के किनारे रहने वाले लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल भी उपलब्ध हो सकेगा।
बीएचयू समेत आठ संस्थानों का सहयोग।
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इन संस्थानों के वैज्ञानिकों ने बनाया प्रोटोकॉल
इस टीम के अन्य सदस्यों में कश्मीर यूनिवर्सिटी, श्रीनगर के अर्थ साइंसेज डिपार्टमेंट के प्रो. गुलाम जीलानी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी, गोवा की डॉ. महुआ साहा, आईआईटी रुड़की के अर्थ साइंसेज डिपार्टमेंट के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य, आईसीएआर-सीआइएफआरआई के डॉ. प्रदीप डे, सीपेट की डॉ. स्मिता मोहंती, सीपीसीबी से जी. त्रिमूर्ति, टीईआरआई के अरुण कंसल और एमएमसीजी की रूबी राजू के नाम शामिल हैं। धीरज जोशी कन्वेनर हैं और एनएमसीजी की डॉ. सहजप्रीत कौर गरेवाल सचिव हैं। एनएमसीजी के डायरेक्टर राजीव कुमार मित्तल और डिप्टी डायरेक्टर नलिन कुमार श्रीवास्तव ने प्रोटोकॉल तैयार करने के दौरान गाइडेंस और देखरेख की।