घर की रसोई में मिट्टी का चूल्हा हो और बेडरूम में पटुआ की सुतली से बिनी खाट तो एक बार आंखों पर यकीन नहीं होगा कि यह जगह प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री का होगा।
ऐसा इसलिए भी क्योंकि अब मंत्री-विधायक तो दूर सत्ताधारी नेताओं के करीबी रिश्तेदार और कारिंदे भी मौका पाकर चंद दिनों में ही ऊंची हवेलियों के मालिक और कंगाल से करोड़पति बन बैठते हैं।
पांच साल साल तक प्रधानमंत्री रहे शास्त्री जी का घर आज भी पुराना वाराणसी के रामनगर में उस दौर की स्वच्छ और ईमानदार राजनीति की गवाही दे रहा है।
संस्कृति मंत्रालय ने देश के दूसरे पीएम के मिट्टी के घर को म्यूजियम के रूप में तब्दील कर दिया है।
आइए, आज जानते हैं सादगी कर्मठता और आदर्श राजनीति के उस चेहरे के बारे में, जो इस दौर की सियासत के लिए सीख भी है और आइना भी।
काशी नरेश के किले से महज डेढ़ सौ मीटर के फासले पर घुमावदार गली के दूसरे मोड़ पर महज सवा विस्वा जमीन पर पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कमरे में अभी वह लालटेन सहेज कर रखी गई है, जिसकी रोशनी में उन्होंने पढ़ाई की थी।
तीन चूल्हे भी उन दिनों के संघर्ष की आंच दबाए वहीं गड़े हैं, जहां उनकी मां राम दुलारी देवी बेटे के लिए उम्मीदों की भाप में खुद तपा करती थीं।
पड़ोस में रहने वाले शास्त्री जी के फुफेरे भाई श्याम मोहन उन दिनों के उनके संघर्ष और सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के बाद की ईमानदारी को याद कर भावुक हो उठे। आंखें भर आईं।
1965 के उस दिन की यादों में खो गए जिस रोज पीएम के रूप में शास्त्री जी घर आए थे। वो बताते हैं कि तब उनकी उम्र 14 साल की थी। दोपहर का वक्त था।
सुबह से ही पुलिस का पहरा रामनगर में लग गया था। भैया की कार के आगे पीछे दर्जनों गाड़ियां थीं। चौक पर काफिला रुका और भैया अंगरक्षकों को रोक कर सीधे सबसे पहले किले में काशीनरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह से मिलने पहुंचे। वहां से पैदल ही गली से होकर घर आए थे।
उनके चाचा काली प्रसाद और किशोरी लाल ने दरवाजे पर अगवानी की थी।
घर आते ही उन्होंने सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी। पंडित जी प्रसाद देने बढ़े तो जांच के लिए सुरक्षा कर्मियों ने लपक लिया। भैया मुस्कुराते हुए बोले- यह मेरा घर है यहां चिंता की कोई बात नहीं।
उन्होंने प्रसाद माथे लगा लिया था।