आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा गुरुवार से पितृपक्ष आरंभ होगा। इसी के साथ काशी में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता के लिए पितृपक्ष के तर्पण-अर्पण और श्राद्ध शुरू होंगे। भटकती आत्माओं की शांति के लिए काशी के पिशाचमोचन कुंड (बिमल तीर्थ) पर त्रिपिंडी श्राद्ध होगा।
इसके लिए पिशाचमोचन की तीर्थपुरोहितों ने सफाई शुरू करा दी है। उधर, सड़कों की पटरियों पर श्राद्ध कराने वाले पुरोहित अपनी चौकिया लगाने में जुट गए। तिल, जौ, अक्षत, पुरवा और कुशासनी का बाजार भी सजने लगा है।
पिशाचमोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध होंगे। जिनके पितरों या परिजनोंकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनकी आत्मा की शांति और परिजनो के भय बाधा को दूर करने के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध के लिए वंशज पड़ोसी देश नेपाल और इंडोनेशिया से भी आएंगे।
पिशाचमोचन कुंड के ब्रम्हबाबा घाट के कर्मकांडी पंडा मुन्ना लाल पांडेय ने बताया कि अनादि काल से भगवान भूत भावन की नगरी काशी के इस कुंड पर अशांत आत्माओं को तृप्त करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध की परंपरा रही है। मान्यता है कि पितरों को प्रेत बाधा और व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है।
काशी पूरे विश्व में मुक्ति दायिनी गंगा के घाटों के लिए विख्यात है। इस बार षष्ठी तिथि का क्षय होने की वजह से पितृपक्ष 14 दिन का ही होगा। विमल तीर्थ पर मंत्रों के साथ तीन मिट्टी के कलश की स्थापना कर काले, लाल और सफेद झंडों का प्रतीक लगाए जाएंगे।
सात्विक, राजसी और तामसी विधि से कर्मकांड किए जाएंगे। इसी तरह मणिकर्णिका तीर्थ पर नेपाली लाल मोहरिया पंडा की ओर से नेपाल से आने वाले वंशजों के लिए श्राद्ध कराए जाएंगे। राजघाट के अलावा धर्मकूप, दशाश्वमेध घाट पर भी श्राद्ध होंगे।