गरुण पुराण में भी है पिशाचमोचन का वर्णन
गरुड़ पुराण में भी पिशाचमोचन कुंड का वर्णन मिलता है। काशी खंड के अनुसार पिशाच मोचन तीर्थ स्थल गंगा के धरती पर आने से पहले स्थित था। कुंड के किनारे बैठकर अकाल मृत्यु के शिकार हुए पितर के लिए श्राद्ध कर्म करने से उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। तीर्थ पुरोहित अजय पांडेय ने बताया कि ये कुंड अनादि काल से पिशाचमोचन में स्थित है तब इसे विमलोदक सरोवर के नाम से जाना जाता था। पुष्कर के रहने वाले ब्राह्मण की अकाल मौत हो गई और वह पिशाच योनि में भटकते हुए विमलोदक सरोवर तक पहुंच गए। सरोवर में डुबकी लगाते ही ब्राह्मण को पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई।
पिशाचमोचन पर ही अश्वदान की परंपरा
काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का कहना है कि काशी को प्रथम पिंड कहते हैं। इसलिए सबसे पहले लोग काशी में पिशाचमोचन कुंड पर आकर पिंडदान करते हैं। उसके बाद गया और फिर अंत में केदारनाथ जाते हैं। पिशाचमोचन तीर्थ पर अश्वदान करने की परंपरा है जो ना तो प्रयागराज में होती है और ना ही गया में। अश्वदान के बाद ही यजमान प्रेत कुंड में पिंड डालने का अधिकारी होता है।
तामसिक भोजन से रहें दूर
ज्योतिषाचार्य आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने बताया कि पितरों की प्रसन्नता के लिए 15 दिन तक बाल और दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए। इससे धन की हानि होती है। श्राद्ध पक्ष में तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज रखना चाहिए और सात्विक भोजन करें। ब्रह्म पुराण के अनुसार पितृपक्ष में पंचबलि करने से पितृदोष का निवारण होता है। पंचबलि के लिए सबसे पहला ग्रास (भोजन) गाय, दूसरा ग्रास कुत्ता, तीसरा ग्रास कौआ के लिए निकाला जाता है। इसके बाद चौथा ग्रास देव बलि होता है, जिसे जल में प्रवाहित किया जाता है अथवा गाय को देते हैं। पांचवा ग्रास चीटियों के लिए रखना चाहिए।