हालांकि उस दौरान भीड़-भाड़ बहुत कम हुआ करती थी। मस्जिद के एक कोने में हेड कांस्टेबल नियमित ड्यूटी देता था। ज्ञानवापी परिसर की पश्चिमी दीवार में शृंगार गौरी का दर्शन होता था। 1992 में अयोध्या विवाद के बाद से मस्जिद की बैरिकेडिंग हो गई और आम लोगों का प्रवेश ही बंद हो गया।
ज्ञानवापी परिसर में नजर आती थी गंगा जमुनी तहजीब
शहर ए मुफ्ती अब्दुल बातिन नोमानी ने बताया कि 1991 के पहले ज्ञानवापी परिसर में गंगा जमुनी तहजीब नजर आती थी। किसी भी तरह की रोक टोक नहीं थी। ढुंढिराज गली में तो शहर भर के मुसलमान ईद की खरीददारी करने आते थे। 1992 के बाद से हालात बदले और पाबंदियां लागू हो गईं। मंदिर-मस्जिद के आसपास हिंदुओं के ही मकान हुआ करते थे लेकिन उनसे कभी किसी तरह का विवाद नहीं हुआ। आज भी लोग दूसरी जगह बस गए हैं लेकिन रिश्ते वैसे ही हैं। महंत परिवार के साथ जो रिश्ता शुरू से था, वह आज भी कायम हैं। इस इलाके के लोगों के बीच आपस में कोई विवाद नहीं हुआ।
महिलाओं के पैरोकार सोहनलाल आर्य ने बताया कि राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, मंजू व्यास, सीता साहू और रेखा पाठक ने 18 अगस्त 2021 को संयुक्त रूप से सिविल जज सीनियर डिवीजन रवि कुमार दिवाकर की अदालत में याचिका दायर की थी।
इसमें मांग की गई थी कि काशी विश्वनाथ धाम-ज्ञानवापी परिसर स्थित शृंगार गौरी और विग्रहों को 1991 की पूर्व स्थिति की तरह नियमित दर्शन-पूजन के लिए सौंपा जाए। आदि विश्वेश्वर परिवार के विग्रहों की यथास्थिति रखी जाए। इससे आम श्रद्धालु शृंगार गौरी का नियमित दर्शन कर सकेंगे।