सुबह 6 बजे से शुरू होती है प्रतियोगिता
विक्की ने बताया कि प्रतियोगिता के दिन सुबह ठीक छह बजे कबूतरों को छतों से एक साथ उड़ाया जाता है। शुरुआत के तीन घंटे सभी कबूतरों के लिए उड़ना अनिवार्य होता है। इसके बाद असली मुकाबला शुरू होता है। तीन घंटे पूरे होने के बाद जो कबूतर जितनी देर तक आसमान में बना रहता है, उसके आधार पर अंक तय किए जाते हैं और अंत में विजेता घोषित किया जाता है। कबूतर उड़ाने वाले प्रतिभागियों के छतों पर एक-एक रेफरी मौजूद रहते हैं। रेफरी कबूतरों के उड़ान भरने का समय और उनके लौटने का समय मिनट और सेकंड दर सेकंड दर्ज करते हैं।
आठ महीने की मेहनत से तैयार होते हैं कबूतर
इस खेल में हिस्सा लेने वाले कबूतरों को 6 से 8 महीने तक नियमित ट्रेनिंग दी जाती है। भारद्वाजी टोला निवासी कबूतर पालने वाले रवि यादव ने बताया कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले कबूतरों में मुख्य रूप से बनारसी नप्ता, घाघरा, कागदी और कासनी प्रजाति के कबूतर होते हैं।
ट्रेनिंग के दौरान शुरुआत में उड़ान का समय कम रखा जाता है। फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाया जाता है। कबूतरों की सहनशक्ति, दिशा पहचानने की क्षमता और वापसी की आदत पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मौसम और हवा की दिशा इस प्रतियोगिता में अहम भूमिका निभाती है। उन्हें बाजरा, ज्वार, मक्का, मसूर, सूरजमुखी के बीज और कुसुम के बीज खिलाए जाते हैं।