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वाराणसी: हरिश्चंद्र घाट पर चार कंधों के लिए मोलभाव, मोक्ष की नगरी में अंतिम संस्कार के लिए चुकाने पड़ रहे इतने पैसे

Mon, 10 May 2021 04:40 PM IST
गीतार्जुन गौतम आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी

सार

- हरिश्चंद्र घाट की 15 सीड़ियां, सौ मीटर की दूरी तक कंधा देने के लिए 35 सौ से चार हजार रुपये प्रति व्यक्ति का रेट रखा गया है।
- परिजनों को संक्रमितों का अंतिम संस्कार करने में 17 हजार से 22 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
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हरिश्चंद्र घाट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर पंद्रह सीढ़ी, सौ मीटर की दूरी और किराया 14 से 15 हजार रुपये। चौंकने की जरूरत नहीं है। मोक्ष की नगरी में अंतिम संस्कार की यह कड़वी हकीकत है। शासन-प्रशासन के तमाम दावों के बावजूद कोरोना संक्रमितों के अंतिम संस्कार में परिजनों को विवशता में जेब ढीली करनी पड़ रही है।

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धर्म, अध्यात्म और मोक्ष की नगरी काशी में अंतिम यात्रा केदौरान शव को कंधा देना जहां कर्तव्य समझा जाता था, वहीं कोरोना संक्रमण ने तो अंतिम यात्रा में चार कंधे मिलना भी मुश्किल हो चुका है। परिजनों की लाचारी और विवशता को देखते हुए हरिश्चंद्र घाट की 15 सीड़ियां, सौ मीटर की दूरी तक कंधा देने के लिए 35 सौ से चार हजार रुपये प्रति व्यक्ति का रेट रखा गया है।

शुरूआत में यह रेट पांच से छह हजार रुपये था लेकिन मौत का आंकड़ा बढ़ने से कंधा देने वालों का रेट भी अब चार गुना बढ़ गया है। शासन और प्रशासन ने कोरोना संक्रमितों का अंतिम संस्कार निशुल्क कर रखा है लेकिन हकीकत कुछ और ही है। परिजनों को संक्रमितों का अंतिम संस्कार करने में 17 हजार से 22 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।

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नहीं शामिल हो रहे हैं परिजन
मोक्ष की नगरी काशी में अब चार कंधे भी बिना पैसों के उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। कोरोना संक्रमण के कारण मौत होने पर परिजन भी अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। स्थितियां ऐसी बन जा रही हैं कि शव के साथ एक या दो आदमी ही घाट पर पहुंच रहे हैं। ऐसे में शव को सड़क से लेकर चिता तक पहुंचाने के लिए चार कंधों का दाम 16 हजार रुपये तक लग रहा है। कुछ युवाओं की टोली पैसों के लिए जान हथेली पर रखकर इस काम को अंजाम दे रही है। एक तरफ जरूरत है तो दूसरी तरफ विवशता।

महामारी काल को कुछ लोगों ने आपदा में अवसर में बदल दिया है। धर्म की नगरी में इस तरह की स्थितियां बेहद शर्मिंदा करने वाली हैं। वर्तमान हालात की विवशताओं को समझा जा सकता है। - प्रो. रामनारायण द्विवेदी, महामंत्री काशी विद्वत परिषद

मोक्ष परंपरा वाला शहर महामारी की चपेट में है। अंतिम यात्रा में चार कंधों के इंतजाम के लिए पैसे देने पड़ रहे हैं। महामारी ऐसी है कि अपने भी अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो रहे हैं। शासन प्रशासन को इस पर विचार करना चाहिए। - महंत बालक दास, पातालपुरी मठ
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केस एक
विनायका निवासी मनीष अपनी मां का शव लेकर हरिश्चंद्र घाट पर पहुंचे तो उनके साथ एक ही रिश्तेदार था। ऐसे में शव को घाट तक ले जाने के लिए चार कंधों की जरूरत थी। घाट पर मौजूद युवक ने पूछा कि आप दो लोग हैं और दो लोगों की और जरूरत पड़ेगी। साढ़े तीन हजार प्रति व्यक्ति के हिसाब से मोलभाव तय हुआ और उसके बाद मनीष ने अपनी माता का अंतिम संस्कार किया।

केस दो
अलईपुरा निवासी संजय प्रसाद अपने रिश्तेदार का शव लेकर वाहन से हरिश्चंद्र घाट पर पहुंचे। दो लोगों के होने के कारण शव को घाट तक ले जाने की समस्या सामने आई तो घाट पर मौजूद युवकों ने कहा कि परेशान ना हों हम कंधा दे देंगे। संजय ने कहा कि कोरोना से मौत हुई तो युवक ने कहा कि कोई बात नहीं है आप बस आठ हजार रुपये दे दिजीएगा और बाकी छह  हजार अंतिम संस्कार की पूरी क्रिया के लिए।
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