भगवान शिव की जटाओं से धरती पर उतरी मोक्षदायिनी गंगा का हाल बाबा भोले की नगरी काशी में बेहाल है। काशी के घाटों से गंगा काफी दूर चली गईं हैं। घाट पड़ताल के तहत आज पढ़ें ललिता घाट से त्रिपुर भैरवी घाट तक का आंखों देखा हाल...
ललिता घाट से आगे की यात्रा का अगला पड़ाव त्रिपुर भैरवी घाट से लेकर मान मंदिर घाट तक रहा। यहां राष्ट्रीय नदी गंगा का हाल देखकर सहसा विश्वास नहीं होता है। घाट की सीढ़ियों से लेकर गंगा तट तक फैली गंदगी, सीढ़ियों से बहता सीवर, पानी में फेंके गए कपड़े और जल में श्रद्धा के रूप में चढ़ाए गए निर्माल्य भी पानी में ही सड़ रहे हैं। रास्ते में पड़ रहे अन्य घाटों के किनारे बने होटलों की गंदगी भी गंगा में ही बहाई जा रही है। इसे देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।
रविवार को गंगा को काफी नजदीक से देखा। आदिकेशव घाट से मानमंदिर घाट तक नालों का गंगा में गिरना जारी है। त्रिपुर भैरवी घाट से थोड़ा आगे बढ़ कर मानमंदिर घाट पर गए तो पाया कि मानमंदिर जाने का रास्ता गंदगी से पटा हुआ है।
दोनों घाटों के बीच श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए बना स्थान यूरिनल में तब्दील हो गया है। कहां पांव रखें, समझ नहीं आता। बचते-बचाते मानमंदिर घाट तक गए तो घाट से गंगा तट तक जहां-जहां नजर पहुंची, गंदगी ही गंदगी नजर आई। नालों के मार्फत मल-मूत्र बदस्तूर गंगा में गिरता मिला। पल भर को सोचना पड़ा, हम गंगा किनारे ही ही तो हैं।
गंगा उस पार तो पूछना ही क्या, वहां तो गंदगी के अलावा और कुछ नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि होटल वाले तो चुपके से गंगा में गंदगी फेंक देेते हैं। मानमंदिर घाट पर मिले गाइड राजकुमार शर्मा, रमेश मल्लाह, राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि आखिर कब ले बनी एसटीपी, केतना कपड़ा बदले क जगह बनी।...अरे काहे वदे घाट पर टायलेट बनल हौ।...अगर बनत हौ त ओकरो निकासी का कौनो रास्ता अबले ना निकलल कुल गंदगिया त गंगा जी में ही जाई...।