काशी में सनातनधर्मियों की आस्था का केंद्र रहा दुर्वासा कुंड अब अतीत बन गया है। कुंड का तो नामोनिशान मिट चुका है। कुछ लोगों ने कुंड ही बेच दिया। फिर इसे पाटकर बस्ती बसा दी गई। अब इस कुंड की सिर्फ स्मृतियां ही रह गई हैं। दुर्वासा आश्रम में कुछ संत और बटुक अब भी वेद अध्ययन करने के साथ ही भजन-कीर्तन करते हैं।
धूपचंडी मुहल्ले में दुर्वासा कुंड तीन दशक पहले तक आबाद था। इस कुंड में पक्की सीढ़ियां थीं। संत और भक्त स्नान करते थे और भगवान नरसिंह की आराधना के लिए भीड़ लगती थी। दंत कथाओं के अनुसार कभी दुर्वासा ऋषि ने काशी में घोर तप कर भक्तों की रक्षा के लिए भगवान नरसिंह को प्रगट किया था। दुर्वासा ऋषि ने ही मां गौरी के रूप में दस महाविद्याओं में से एक मां धूमावती को प्रसन्न किया था। नरसिंह टीले के पास ही धूमावती माता का दरबार है, जहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है।
कहा जाता है कि दुर्वासा ऋषि के आश्रम में उस दौर में 16 हजार से अधिक संत रहते थे। इन संतों के लिए दुर्वासा ऋषि ने विशाल कुंड भी खुदवाया था। उसी कुंड को दुर्वासा कुंड के नाम से जानते हैं। इस कुंड को बाद में मल्लाहों को मछली पालने के लिए पट्टे पर दे दिया गया था। जिन मल्लाहों को आजीविका चलाने के लिए पट्टा किया गया था, उन्होंने ही बाद में इसे कुछ लोगों के हाथ बेच दिया। इसके बाद कुंड को पाटकर उस पर कॉलोनी बसा दी गई।
इस कुंड पर अब चार से अधिक गलियां हैं, दो सौ से अधिक मकान बन गए हैं। कुछ बचे हुए हिस्से को भी लोगों ने घेर लिया है। कभी दुर्वासा कुंड के जल के सेवन से बीमारियां दूर होती थीं। त्वचा संबंधी रोग दूर हो जाते थे लेकिन अब उस कुंड का नामोनिशान तक नहीं बचा है। सिर्फ प्रतीक के तौर पर दुर्वासा आश्रम रह गया है लेकिन उस पर भी कब्जे को लेकर जब-तब विवाद छिड़ा रहता है।