जिस गांव से आप निकले वहां पर अब खेलों की क्या स्थिति है?
गांव के दो लड़के जूनियर और अंडर 18 टीम में हैं। 10-12 साल के बच्चों को खेलने के लिए टर्फ मिलता है। अभी भी हमारे पुराने कोच ही ट्रेनिंग दे रहे हैं।
करमपुर के खिलाड़ियों को क्या-क्या सफलताएं मिली हैं?
करमपुर गांव की एकेडमी से ही 400 युवाओं को खेल कोटे के चलते नौकरी मिल चुकी है। रेलवे, आर्मी, सीएजी, आयकर और पुलिस विभाग में ये कार्य कर रहे हैं। इनमें तीन लड़कियां भी हैं। करमपुर की एकेडमी में अभी 40 लड़कियां प्रैक्टिस कर रही हैं।
हॉकी का सफर शुरू हुआ तो क्या दिक्कतें आईं?
40 साल से करमपुर में निशुल्क एकेडमी चल रही है। एकेडमी संचालक तेज बहादुर सिंह थे। ऐसे तो गांव रहने पर खेलने के लिए कभी आर्थिक संकट नहीं सामने आया। संसाधनों की कमी जरूर थी, उस समय एस्ट्रोटर्फ नहीं घास के ही मैदान पर प्रैक्टिस होती थी, इसलिए वहां से निकलकर लखनऊ स्पोर्ट्स कॉलेज में प्रवेश लेना पड़ा।
पिता ट्रक ड्राइवर की एक्सीडेंट में निधन, मां ने खेलने से नहीं रोका?
नहीं, पिता चौधरी कल्पनाथ पाल का ट्रक से ही एक्सीडेंट हो गया था। मां ने संभाला, वह चाहती तो नहीं जाने देतीं। करमपुर में ही खेलता था। निधन के एक साल के बाद ही लखनऊ चला गया था। पिता का साया उठा तो मां ने हिम्मत दिखाई। हॉस्टल भेज दिया। गाय और खेत संभालकर खर्च चलाती थीं।
पहली बार शहर के स्पोर्ट्स कॉलेज पहुंचने पर क्या दिक्कतें आईं?
लखनऊ हॉस्टल में गया था तो जूनियर के कैंप में नाम नहीं आया। आयु बढ़ गया तो सीधे सीनियर में गया। रेलवे की नौकरी का ऑफर आया था तो ज्वाइन नहीं किया। रेलवे कर्मचारी बनना मंजूर नहीं था। ऐसे में सीनियर वर्ग में मेहनत की।