'महामना' पंडित मदन मोहन मालवीय
बैठक में एक संकल्प पारित किया गया, जिसे भारत सरकार और लंदन स्थित सेक्रेट्ररी ऑफ स्टेट को भेजा गया। महामना को यह सब पसंद नहीं था। वे चाहते थे कि विश्वविद्यालय से जुड़ा कोई भी कर्मचारी राजनीति में किसी तरह की सहभागिता न करें। कुछ लोगों को यह अपमानजनक लगा कि पंडित मदन मोहन मालवीय जब स्वयं देश के लोकप्रिय नेता है, तो उन्हें विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को राजनीति में भाग लेने से नहीं मना करना चाहिए।
बीएचयू चांसलर और महामना के प्रपौत्र गिरधर मालवीय ने कहा कि महामना हमेशा यही चाहते थे कि विश्वविद्यालय के जो छात्र हों, वह केवल पढ़ाई पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। शिक्षण संस्थानों में राजनीति न किए जाने के उनके विरोध के पीछे भी यही वजह थी। महामना की जयंती पर लोगों को यही संकल्प लेते हुए जीवन में सफलता के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहना चाहिए। यह बिल्कुल सही है कि शिक्षण संस्थानों में राजनीति नहीं होनी चाहिए।
महामना मदनमोहन मालवीय ने असहयोग आंदोलन का विरोध भी किया। 1917 के बाद कुछ ही साल के भीतर देश में राजनीतिक स्थिति बिगड़ गई। सितंबर 1920 में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन आहूत किया गया, जिसमें महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का मुख्य संकल्प भी पारित हुआ।
इसमें एक प्रस्ताव यह भी था कि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान और राष्ट्रीय स्कूल एवं कॉलेज खोलने का बहिष्कार किया जाए। महामना ने अंग्रेजी हुकूमत और लोगों के बीच समझौता कराने की कोशिश की लेकिन वह असफल रहे। 1921 में देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय महाविद्यालय, राष्ट्रीय विद्यालय और विश्वविद्यालय शुरू किए गए।
फूलों से महकी महामना की बगिया
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इसमें राष्ट्रीय शिक्षा के प्रोत्साहन पर विशेष बल दिया गया। इस दौरान महामना ने देश के कई हिस्सों का दौराकर स्वराज और स्वदेशी का उपदेश दिया। अंग्रेजी हुकूमत ने कई बार उन पर प्रतिबंध लगाया लेकिन इसके बाद भी महामना ने दौरा जारी रखा और जनसभा की, लेकिन उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया।