तबला सम्राट पं. किशन महाराज स्पष्टवादी थे। एक बार अमेरिका में तबला बजाने गए थे। कार्यक्रम स्थल पर केवल अमेरिका का झंडा देखकर आयोजकों से कहा, भारत का क्यों नहीं है? बोले- जब तक तिरंगा नहीं लगेगा तब तक तबला नहीं बजाएंगे। फिर 25 किमी दूर से आयोजकों ने तिरंगा मंगाया।
ऐसे ही जब संपूर्णानंद जी राजस्थान के राज्यपाल थे, तब वह जयपुर में कार्यक्रम पेश करने गए थे। कलाकारों को जमीन पर बैठाया गया था और श्रोता ऊपर बैठे थे। उन्होंने इसका भी विरोध किया। तब जल्द से जल्द स्टेज बनाया गया, इसके बाद ही उन्होंने प्रस्तुति दी।
उनके तबले में इतना दम था कि एक बार दशाश्वमेध पर कविराज पं. आशुतोष भट्टाचार्य के यहां कार्यक्रम पेश करने पहुंचे थे, तभी चर्चा होने लगी कि कलाकारों की कला साधना से दीपक जल या बुझ जाया करते थे। पं. किशन महाराज की प्रस्तुति जब चरम पर पहुंची, तभी तबले की धमक से आयोजन स्थल की छत का धरन टूटकर गिर गया। इसके बाद भी उनका तबला नहीं थमा।
उन्होंने बाई जी के कोठों पर तबला बजाने का विरोध किया था। उनकी ही देन थी कि तबले को संगतकारी का स्थान मिला। पिताजी चित्रकला, बागवानी, निशानेबाजी, फोटोग्राफी, ड्राइविंग के शौकीन थे। एक बार उनकी कश्मीर में शानदार तबले की प्रस्तुति देखकर वहां के राजा हरि सिंह काफी खुश हुए और उनसे इच्छानुसार कुछ भी मांगने को कहा।
तब पिता जी ने उनसे मोटरसाइकिल मांगी। वो मोटरसाइकिल उन्होंने कई वर्षों तक चलाई। उनको बग्घी चलाने का भी शौक था। बग्घी से ही रामनगर रामलीला देखने जाते थे। शिष्यों के साथ सिखाते समय बेहद सख्ती से पेश आते थे। मैं उनसे बहुत डरता था। एक बार सिखाने के दौरान धिर-धिर... की धुन ठीक से नहीं निकल रही थी तो उन्होंने हथौड़ा चलाकर मार दिया था।
वो कहते थे - कम खाने वाला ही लयदार हो सकता है। इसलिए कलाकार को ज्यादा नहीं खाना चाहिए। शादी के कुछ साल बाद पिता जी संकटमोचन में जाकर रहने लगे थे। वहीं पर एक कमरा लेकर पं. अमरनाथ मिश्र के साथ रियाज करते थे।
एक साल मुंबई में उन्होंने फुटपाथ पर गुजारा। धीरे-धीरे उनकी पहचान बड़े कलाकारों के साथ हुई। पं. रविशंकर, सितारा देवी आदि कलाकारों के साथ संगत की और उनके साथ फिल्मों में भी बजाया। उनका जन्म 3 सितंबर 1923 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था। इसलिए मेरे दादा उनको किशन कहकर पुकारते थे। बाद में यही नाम प्रसिद्ध हो गया।
-पं. पूरन महाराज, पुत्र