काशी में परंपराएं पलती ही नहीं, टूटती भी हैं। इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रशासनिक सेवाओं के ग्लैमर के बीच सौ से अधिक कन्याएं वेद पढ़कर कर्मकांड के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेंगी।
माथे पर तिलक-त्रिपुंड, गले में रुद्राक्ष, तुलसी की कंठी और कंधे पर पीतांबरी दुपट्टा धारण किए कर्मकांडी लड़कियां रुद्रहोम, शतचंडी यज्ञ, पूजा, कर्मकांड, विवाह और अन्य संस्कार आचार्य के तौर पर कराने लगी हैं। खास बात यह कि इनमें तमाम लड़कियां गैर ब्राह्मण परिवारों की हैं।
पाणिनी कन्या महाविद्यालय में वेद पढ़ रही इन लड़कियों को देश के अलग-अलग हिस्सों से ही नहीं, अमेरिका और कनाडा से भी कर्मकांड कराने के लिए बुलाया जा रहा है।
स्त्रियों के लिए जहां सनातनी समाज में वेद पढ़ना वर्जित रहा है, वहीं मिथकों को तोड़ कर आगे बढ़ रहीं बेटियां अब काशी की पांडित्य परंपरा पर भी छा जाने के लिए तैयार हैं। पाणिनी कन्या महाविद्यालय में फिलहाल सौ से अधिक लड़कियां वेद का अध्ययन कर रही हैं।
कोई श्रीमद्भागवत की व्याख्याता बनना चाहती हैं तो किसी का सपना वेद प्रचार के लिए विश्व व्यापी अभियान पर निकलने का है। पड़ोसी देश नेपाल के अलावा बिहार, विशाखापत्तनम, हैदराबाद, रांची और यूपी के विभिन्न जिलों से गैर ब्राह्मण समुदायों की भी बेटियां यहां वेद अध्ययन कर कर्मकांड सीख रही हैं।
महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. नंदिता शास्त्री बताती हैं कि अब तक दो हजार से अधिक लड़कियां वहां से वेद पढ़कर निकल चुकी हैं। बिना जनेऊ धारण किए वेदपाठ नहीं किया जा सकता। इसलिए इन लड़कियों का पहले उपनयन संस्कार कराया जाता है।
वेद पढ़ने वाली बेटियों को कर्मकांड के क्षेत्र में रोजगार के जबरदस्त अवसर मिल रहे हैं। देश-विदेश से यज्ञ, कर्मकांड कराने के लिए इन्हें बुलाया जाने लगा है। पाणिनी कन्या महाविद्यालय की 22 कन्याओं को वेद पंडिता की उपाधि से नवाजा गया है। सांदीपनि संस्कृत वेद केंद्र की ओर से इन वेदपाठी कन्याओं को यह उपाधि दी गई।