नागरी प्रचारिणी सभा के चुनाव की घोषणा होने के बाद कई सारे रहस्यों से अब धीरे-धीरे परदा हटने लगा है। बौद्धिक संपदा को बचाने के साथ ही 128 साल पुरानी धरोहर को संजोने के लिए साहित्यकार समाज ने भी पहल की है। वहीं नागरी के 17 हजार हस्तलेखों का डिजिटलाइजेशन अभी तक आम जन को उपलब्ध नहीं हो सका है।
सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सेंटर फार डेवलपमेंट आफ एडवांस कंप्यूटिंग को 1998 में हस्तलेखों को डिजिटल करने की जिम्मेदारी दी गई। सीडेस्को ने नागरी प्रचारिणी सभा की 19वीं शताब्दी से लेकर 1950 तक उपलब्ध दुर्लभ पांडुलिपियों, पुरानी पत्रिकाओं, दुर्लभ हिंदी पुस्तकों का डिजिटल आर्काइव तैयार किया। इस आर्काइव में 35 लाख पृष्ठों को शामिल किया गया। सीडेस्को को इस कार्य के लिए सरकार की तरफ से 93 लाख का अनुदान दिया गया था। इस मामले में व्योमेश शुक्ला ने यह सवाल उठाया है कि 23 साल बीतने के बाद भी डिजिटल हस्तलेख कहां हैं, इसका किसी को पता ही नहीं है। सभा के अपर सचिव सभाजीत शुक्ला ने बताया कि उन्होंने राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के निदेशक को 17 हजार हस्तलेखों के संरक्षित किए जाने की जानकारी पत्र द्वारा उपलब्ध करा दी है।
19 विषय हैं शामिल
दुर्लभ हस्तग्रंथों में 19 विषयों को शामिल किया गया है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, योग, आयुर्वेद, इतिहास, कर्मकांड, कामशास्त्र, गणित, गीता, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, धर्म, नीति, भूगोल, शकुन, शालिहोत्र, सामुद्रिकशास्त्र, साहित्य, स्तोत्र, स्वरोदय विषयों के हस्तलेख हैं।
नष्ट होते हस्तलिखित ग्रंथों की हुई थी खोज
नागरी प्रचारिणी सभा ने स्थापना के साथ ही प्राचीन विद्वानों के हस्तलेख नगरों और देहातों में से एकत्र कराना शुरू किया। 1900 से सभा ने अन्वेषकों को गांव-गांव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरंभ किया कि किसके यहां कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी यह कार्य हुआ। इस खोज की त्रिवार्षिक रिपोर्ट भी सभा प्रकाशित करती है। हस्तलिखित ग्रंथों की खोज का संक्षिप्त विवरण भी चार भागों में सभा ने प्रकाशित किया है। परिणामस्वरूप ही हिंदी साहित्य का व्यवस्थित इतिहास तैयार हो सका और अनेक अज्ञात व ज्ञात लेखकों की अनेक अज्ञात कृतियां प्रकाश में आई हैं।