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निशि अंधियारी कारी बिजुरी चमके, छाई घटा घनघोर...

Wed, 20 Jul 2016 02:23 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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पं. शिवनाथ मिश्र
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सावन कजरी की फुहार और जिंदगी में बहार लेकर आता है। आषाढ़ के मेघों की फुहार पाकर कनकनाए पौधों में सावन में फूल खिलने लग जाते हैं। इसी तरह सावन में भींगने का बहुत मन करता है। सावन की फुहारें जब गुलाबजल की तरह रिमझिम संगीत लेकर आती हैं तो तमाम उदास दिलों में झूले -हिंडोले पड़ने लगते हैं। मन झूम उठता है। यह कहना है प्रसिद्ध सितार वादक पं. शिवनाथ मिश्र का। अषाढ़ के आखिरी दिन उन्होंने मेघ और मल्हार की विदाई और कजरी की शुरुआत पर चर्चा की।
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बनारस घराने में सितार के पर्याय बन चुके पं. शिवनाथ मिश्र पावस ऋतु का नाम आते ही मुस्कुराने लगते हैं। वह मल्हार की बंदिश से अपनी बात शुरू करते हैं- पहिरे चुनर सुरंग/अंग भूषण नयो/नयो बादर नयो जोबन ब्रजनारी को...। वह कहते हैं कि प्रकृति की नया कलेवर नहीं धारण करती, स्त्री-पुरुष भी नए रूप-रंग में, ताजगी के एहसास में डूूबने लग जाते हैं।


     आषाढ़ की घटा और सावन की छटा का हर किसी को शिद्दत से इंतजार रहता है। परदेसी पिया की पुकार विरहिनी तो करती ही ही, घटाओं को निहार कर पूरी प्रकृति नाच उठती है। पालस ऋतु के तीन महीने आषाढ़, सावन, भादों में बारिश की बूंदें एक चाल नहीं होतीं। आषाढ़ में ज्यादा भींगेंगे तो बीमार होने का डर रहता है लेकिन सावनी फुहार हो तो भला कौन भीगना नहीं चाहेगा। वह फिर राग मिया मल्हार की बंदिश पर स्वर लगाते हैं-बिजुरी चमके बरसे मेघा/ मेहरवा आई बदरिया/गरज गरज मोहें अतिहिं डरावे/घन दमके घन दामिनी चमके/पहीपा पीहू पीहू टेर सुनावे/कहां करूं कित जाऊं मोरा जिया तरसे...। पं. शिवनाथ कहते हैं कि मल्हार की इस बंदिश के एक-एक शब्द में विरह वेदना भरी है। मेघों का गरजना उनके बरसने का एहसास पैदा करता है।
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इसी में मिलन की पीर भी है और अकेले होने का डर भी। फिर वह दूसरी बंदिश पर स्वरों का समन्वय शुरू कर देते हैं। बोले रे पपीहरा अब घन गरजे/उड़न उड़न कर आई बदरिया/बरसन लागी सदा रंगीले/लपक-झपक कर दामिनी चमके/कौंध -कौंध मेरा जियरा लरजे...। पंडित जी कहते हैं कि मेघों के गरजने की जो हूक पपीहे की पुकार में है, वह किसी में नहीं। बनारस घराने के गायकी अंग को सितार पर बजाने वाले पं. शिवनाथ का कहना है कि जब स्वरों का समन्वय सही तरीके से होता है तो बिजली की यह चमक, बादलों की गरज-तरज का बखूबी अनुभव होने लगता है। वह फिर सावनी फुहार की ओर बढ़ते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की सबसे प्रिय कजरी को वह सितार की धुन पर बजाते हैं-वीरन भइया अइलें अनवइयवा सवनवां में ना जइबे ननदी...। वह कहते हैं कि सावन तो ससुराल से नैहर जाने का महीना है। यह वैसे भी विरह बढ़ा देता है।   
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