‘चट देनी मार देले खींच के तमाचा, हीं-हीं हीं-हीं हंस देले रिंकिया के पापा’। भोजपुरी का यह लोकगीत नाइजीरिया के गायक सैमुअल सिंह की आवाज में लोकप्रियता की नई बुलंदियां छू रहा है। इस गीत ने कैरिबियाई देशों में प्रचलित बैठक गाना और चटनी संगीत की याद ताजा कर दी है।
प्रवासी भारतीय सम्मेलन में ट्रिनिडाड, टोबैगो और मॉरीशस से बड़ी संख्या में आ रहे भारतवंशियों की दिलचस्पी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी लोकसंगीत में अपनी जड़ें तलाशने में हो सकती है। बैठक गाने से हम दूर देश में रची-बसी अपनी गंगा-जमुनी तहजीब का मूल समझ सकते हैं।
ट्रिनिडाड में चटनी संगीत के प्रणेता पाप गायक सुदर पोपो हैं, जिन्होंने भोजपुरी लोकगीतों को पाश्चात्य संगीत के साथ मिला कर नया ब्लेंड तैयार किया था। उनका गाया ‘फुलौरी बिन चटनी’ जस का तस उनके यहां के कंचन और बाबला ने गाया, जो पूरे देश में सुना गया।
चटनी संगीत ट्रिनिडाड के अलावा मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम, जमैका, फिजी से लेकर दक्षिण अफ्रीका में भी लोकप्रिय है। इसमें ढोलक, तबला, मंजीरा, हारमोनियम, खड़ताल के अलावा बुलबुल तरंग (बेंजो जैसा बाजा) और धनताल (लोहे की रॉड) का इस्तेमाल होता है।