बीएचयू में चल रहा राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव
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देश में विलुप्त हो रहीं लोक कलाओं, संस्कृतियों, लोक परंपराओं को राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव से संजीवनी मिल रही है। 2015 में नई दिल्ली से इस महोत्सव की शुरुआत हुई थी। इस बार काशी में सफल आयोजन ने इसे नई ऊंचाई दी है। अगले साल ऐसे 10 आयोजन होने हैं।
आगाज फरवरी में जम्मू से होगा, इसके बाद मार्च में अरुणाचल प्रदेश में। ऐसे आयोजनों से न केवल विरासत को सहेजने में मदद मिल रही है, बल्कि कलाकारों समेत तमाम लोगों को रोजगार मुहैया हो रहा है। कारपोेरेट जगत में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी कलाकारों की मांग बढ़ी है।
राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव का उद्देश्य छिपी प्रतिभाओं को भी बाहर निकालना भी है। लोक कलाओं और परंपराओं को जीवित रखने के लिए 1992 में लोकतरंग की शुरुआत हुई थी। तब स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ही आयोजन होते थे लेकिन 2015 में इन कलाओं को जन-जन तक पहुंचाने और सहेजने के उद्देश्य से राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव शुरू किया गया।
नार्थ जोन कल्चरल सेंटर पटियाला (पंजाब) के कार्यकारी एवं कार्यक्रम अधिकारी रवींद्र शर्मा ने बताया कि इस आयोजन से भारतीय कलाओं और परंपराओं तथा कलाकारों का डंका सात समंदर पार भी बज रहा है। राजस्थान के कलाकार पेरिस में छह-छह महीने तक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।