वाराणसी शहर में आज अलग-अलग धर्म, परंपरा और संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। भक्ति और उल्लास के बीच कई समाज नए साल का जश्न मनाएंगे। नवरात्र के साथ मराठी, सिंधी व हिंदू परिवारों के नए वर्ष की शुरुआत हो चुकी है, वहीं 15 अप्रैल से कई अन्य समाज के नववर्ष की शुरुआत हो जाएगी। इसको लेकर हर समाज के लोग अपने परंपरा के अनुसार तैयारियों में जुट गए हैं। जहां बंगाली समाज पोहिला बैसाख मनाएगा। वहीं मिथिला समाज के लोग जुड़ शीतल का पर्व मनाएगा। इसके साथ पंजाबी समुदाय बैसाखी की खुशियां मनाएगा।
फसल कटने की मनाते हैं खुशियां
सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह ने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की नींव रखी थी। इसमें फसल पकने के बाद उसके कटने की तैयारी का उल्लास साफ झलकता है। गुरुधाम निवासी शोभा कपूर बताती हैं कि बैसाखी पर खेतों में फसल पककर सुनहरी हो जाती है और नए पत्तों से सजे पेड़ पौधे हरी चादर ओढ़ लेते हैं। बैसाखी को लेकर गुरुद्वारों में तैयारियां पूरी हो गईं हैं। गुरुद्वारे में दीवान सजेंगे और शबद-कीर्तन होगा।
बंगाली समाज मनाएंगे पोहिला बैसाख
पारंपरिक बंगाली परिधान, बांग्ला गान के बीच बृहस्पतिवार को पोहिला बैसाख का जश्न मनाया जाएगा। वाराणसी दुर्गोत्सव सम्मिलनी के अध्यक्ष देवाशीष दास ने बताया कि पोहिला बैसाख का दिन बंगाली समाज में व्यापारियों के लिए खास होता है। नए साल के साथ ही नए लेखा-जोखा की शुरुआत होती है। सुबह मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद घर-घर पकवान बनाए जाते हैं। इन दिन बंगाली काली मंदिरों में दर्शन पूजन करते हैं।
मिट्टी लगाकर देते हैं बधाई
मिथिला समाज के लोग नव वर्ष पर जुड़ शीतल का पर्व मनाएंगे। सुंदरपुर निवासी प्रियंका झा बताती हैं कि जुड़ शीतल पर घर-आंगन की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मिथिला समाज के लोग एक-दूसरे को गीली मिट्टी लगाकर नववर्ष की बधाई देते हैं, क्योंकि यह पर्व किसानों से जुड़ा है, इसलिए इस दिन गीली मिट्टी के साथ खेलने का भी रिवाज है। इस दिन पुराने वृक्षों की जड़ों में पानी दिया जाता है और नए पौधे लगाकर लोग पर्यावरण को बचाने का संकल्प लेते हैैं।