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नीट री-एग्जाम: बेटे की तैयारी के लिए BHU की वैज्ञानिक से गृहिणी बन गईं मां, आर्यन ने कहा- न्यूरो सर्जन बनूंगा

Fri, 17 Jul 2026 01:19 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

NEET Re-Exam: आर्यन की इस उपलब्धि पर उनके परिजनों, शिक्षकों और शुभचिंतकों ने खुशी जताते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है। उनकी सफलता ने वाराणसी के विद्यार्थियों के लिए एक नई प्रेरणा प्रस्तुत की है।
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आर्यन दुबे। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Varanasi News: आईएमएस बीएचयू में रिसर्च साइंटिस्ट थीं। तीन साल तक मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के लैब में वैज्ञानिक का काम किया। तब तक बेटा हाईस्कूल में पहुंच गया था, पढ़ाई का दबाव बढ़ने लगा। 

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मां ने कॅरिअर के मुहाने पर रिस्क लेकर वैज्ञानिक की नौकरी आगे न करने का फैसला ले लिया। एक मां जो वैज्ञानिक से गृहिणी तो बनी लेकिन मेंटोर के तौर पर बेटे की तैयारी कराने में लगी रहीं। नीट री-एग्जाम के यूपी टॉपर और सातवीं रैंक लाने वाले आर्यन दुबे की मां डॉ. मोनू पांडेय की अमर उजाला से बातचीत में ये बात सामने आई। उनका कहना है कि कुछ बड़ा पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है। लेकिन, खोना भी तभी चाहिए जब अपने मेहनत का ईमान पक्का हो।


नीट यूजी के यूपी टॉपर आर्यन की मां डॉ. पांडेय ने कहा कि बढ़ते प्रतिस्पर्धी माहौल में बेटे की ईमानदारी पूर्वक तैयारी पर पूरा भरोसा था। उसके ऊपर दबाव नहीं बनाया। आर्यन के साथ बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। सिलेबस के अनुसार ही अपना टाइम टेबल खुद ही बना लेता था। लेकिन मेरे घर पर रहने से अच्छी मेंटोरशिप मिल गई। हम अपनी उपलब्धियों से उतना खुश नहीं होते जितना कि बच्चे की सफलता पर होते हैं।

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बेटा रैंक होल्डर, पिता आईआईटी की रैंकिंग समिति के उपाध्यक्ष
नीट के टॉप-10 टॉपरों में शामिल आर्यन दुबे के पिता प्रो. विकास कुमार दुबे आईआईटी बीएचयू की वैश्विक और राष्ट्रीय रैंकिंग को मेंटेन करने काम करते हैं। वह आईआईटी बीएचयू की रैंकिंग समिति के उपाध्यक्ष के साथ ही बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर भी हैं। डीन भी रह चुके हैं। आर्यन की बहन प्रकृति दुबे 11वीं में हैं। वो भी अब अपने भाई के नक्शे कदम पर चलने को तैयार हैं।

पिता प्रो. दुबे ने कहा कि उन्हें ये पता था कि नीट में उसको सफलता मिलेगी लेकिन टॉपर निकलेगा ये अंदाजा नहीं लगाया था। पत्नी ने त्याग किया और घर रहकर बच्चों को बेहतर गाइडेंस दिया। आर्यन में सेल्फ मोटिवेशन की भावना थी। आम घरों की तरह अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बार-बार टोका या बोला नहीं बल्कि हमने सिर्फ उसका हाथ पकड़ा, लेकिन चला वो खुद के पैरों से ही।
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जो काम नहीं किया
  • वेब सीरीज, सोशल मीडिया पर फोटो और रीलबाजी। 
  • वीडियो और मोबाइल गेम्स में ज्यादा समय बर्बाद नहीं किया। 
  • यू-ट्यूब के वीडियो या रील देखने की आदत नहीं डाली। 
  • रिश्तेदार या आसपास की शादियों में नहीं गया। 
  • दूसरों के जन्मदिन सेलिब्रेशन में शरीक नहीं हो पाया। 
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