बलिया लोकसभा सीट लंबे समय तक पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नाम से जानी जाती रही। जनता पार्टी की लहर में 1977 से 2004 तक चंद्रशेखर ने संसद में आठ बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। बाद में यह सीट उनके पुत्र नीरज शेखर के पास थी। अपने जीवनकाल में ना तो चंद्रशेखर ने बलिया छोड़ा और ना बलिया के वोटरों ने उनको।
इस दौरान 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर जगन्नाथ चौधरी से हार गए थे। राजनीति में कितने भी उलटफेर हुए हों। अपने बयानों और काम से चंद्रशेखर की आलोचना देश भर में हुई लेकिन बलिया की जनता हमेशा उनके साथ रही थी। उनके निधन के बाद यह सीट उनके छोटे पुत्र नीरज शेखर के पास रही।
पहले चुनाव में निर्दलीय सांसद चुने गए :
बलिया के बागीपन की कहानी लोकसभा के पहले आम चुनाव में ही दिख गई थी। 1952 में कांग्रेस के टिकट नहीं देने पर मुरली बाबू ने निर्दलाय चुनाव लड़ा था। उन्होंने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के बेटे गोविंद मालवीय को पराजित किया। 1962 में कांग्रेस ने मुरली बाबू को प्रत्याशी बनाया और वह जीते। 1967 और 1971 में भी यहां से कांग्रेस जीती।
परिसीमन से बदला लोकसभा का भूगोल :
2009 में हुए परिसीमन में बलिया लोकसभा सीट का पूरा भूगोल बदल गया। इस लोकसभा क्षेत्र में बलिया जिले के तीन विधानसभा क्षेत्र बैरिया, बलिया सदर और फेफना के अलावा गाजीपुर जिले की दो विधानसभा सीटें जहूराबाद और मुहम्मदाबाद को मिलाकर बलिया लोकसभा क्षेत्र बनाया गया है।