संस्कृति और संगीत के अटूट बंधन के बीच एक सेतुबंध की तरह थीं अप्पा। ठुमरी को भारतीय शास्त्रीय संगीत के कलेवर से निकालकर विश्व पटल पर पहुंचाने वाली गिरिजा देवी की कमी तो खलेगी ही।
परंपरा और धरोहरों की सशक्त हस्ताक्षर रहीं अप्पा की कमी अब नैमिषेय समिति को भी महसूस होगी। अब अप्पा के जाने के बाद समिति से वह अंगुली छूट गई जिसे पकड़कर गीत संगीत को आगे बढ़ाना था, पर अप्पा ने संगीत के लिए जो योगदान दिया उस रोशनी में समिति की राह जरूर आसान होगी।
भारत की संस्कृति और सभ्यता को सहेजने और संरक्षित करने के लिए काशी को केंद्र में रखकर बीते साल दिसंबर में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ‘नैमिषेय समिति’ के गठन का प्रस्ताव रखा गया था।
संस्कृति महोत्सव के दौरान प्रस्तावित इस समिति की मुख्य मार्गदर्शक सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को बनाए जाने की बात कही गई तो मार्गदर्शक के तौर पर पद्मविभूषण गिरिजा देवी के नाम पर मुहर लगी थी।
काशी केंद्र हो और बात संस्कृति व सभ्यता हो सहेजने की, उसे रचने बसने की हो तो फिर अप्पा को कहां भुला जा सकता था, सो उन्हें इसका मार्गदर्शक बनाया गया।
18 दिसंबर को बीएचयू स्वतंत्रता भवन में ‘संस्कृति और सभ्यता में नैमिषारण्य’ विषयक इस संगोष्ठी में डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी, सोनल मानसिंह, प्रो. सच्चिदानंद जोशी समेत देश भर से आए साहित्यकार, कलाकार, फिल्मकारों ने मार्गदर्शक के तौर पर गिरिजा देवी के नाम पर मुहर लगाई थी।
बीएचयू के प्रो. सदाशिव द्विवेदी कहते हैं कि अब गिरिजा देवी जी के न रहने से इसमें शून्यता आ जाएगी। नैमिषारण्य परंपरा को विराट रूप में ‘संस्कृति नैमिषेय’ के रूप में 2018 में आयोजित करने की तैयारी की जा रही है।
इस आयोजन में भी उनकी कमी शिद्दत से महसूस होगी। दुखते मन से हमें अब अप्पा का चले जाना स्वीकारना होगा पर नैमिषेय समिति अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हो, यही अप्पा के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।